

कांग्रेस की जुबान क्यों सिली — हिमांशु गाबा, तिलक राज बेहड़, मीना शर्मा, संजय जुनेजा और मोहनखेड़ा खामोश;
“समाचार इंडिया 1” संवाद, रुद्रपुर -रुद्रपुर के इंदिरा चौक पर लगी देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रतिमा को अतिक्रमण की जद में बताकर हटाए जाने और उसकी जगह त्रिशूल निर्माण कराए जाने का निर्णय शहर की सियासत में भूचाल ले आया है। नगर निगम इसे सौंदर्यीकरण और यातायात सुधार की कार्रवाई बता रहा है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या प्रशासनिक फैसलों के नाम पर ऐतिहासिक विरासतों को इस तरह विस्थापित किया जाना चाहिए? जिस नेता को 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद तत्कालीन विपक्ष के वरिष्ठ नेता और बाद में प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी ने “दुर्गा” की उपाधि दी थी, वही इंदिरा गांधी आज रुद्रपुर के प्रमुख चौराहे से हटा दी गईं। दुनिया में “आयरन लेडी” के नाम से विख्यात इस शख्सियत की प्रतिमा का हटना केवल एक मूर्ति का स्थानांतरण नहीं बल्कि इतिहास, स्मृति और प्रतीकों की राजनीति का संवेदनशील अध्याय बन गया है।


- इंदिरा गांधी का कार्यकाल भारतीय इतिहास के निर्णायक पड़ावों से जुड़ा रहा है। 1971 के युद्ध में विजय और बांग्लादेश के निर्माण ने भारत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दी। 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण और 1974 का पोखरण परमाणु परीक्षण भारत की आर्थिक और सामरिक आत्मनिर्भरता के प्रतीक बने। 1975 की आपातकाल अवधि उनके राजनीतिक जीवन का विवादित अध्याय अवश्य रहा, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि उन्होंने लंबे समय तक भारतीय राजनीति की धुरी के रूप में कार्य किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की मजबूत छवि गढ़ी। ऐसे व्यक्तित्व की प्रतिमा को हटाया जाना स्वाभाविक रूप से भावनात्मक और राजनीतिक बहस को जन्म देता है। “स्वर्गीय इंदिरा गांधी के अपमान लिए कौन आंसू बाहेगा मीना जी “
रुद्रपुर की राजनीति में सबसे अधिक चर्चा कांग्रेस नेताओं की चुप्पी को लेकर है। जिला अध्यक्ष हिमांशु गाबा, किच्छा के विधायक और पूर्व मंत्री तिलक राज बेहड़, पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष मीना शर्मा, व्यापार मंडल अध्यक्ष संजय जुनेजा और मेयर प्रत्याशी रहे मोहनखेड़ा जैसे नाम स्थानीय राजनीति में प्रभावशाली माने जाते हैं। लेकिन अब तक इस मुद्दे पर उनकी ओर से कोई मुखर विरोध सामने नहीं आया। शहर में तंज कसा जा रहा है कि क्या कांग्रेस की “जुबान भी सिली” हुई है? क्या यह रणनीतिक मौन है, अंदरूनी खींचतान का परिणाम है या फिर राजनीतिक जोखिम से बचने की कोशिश? जिस नेता ने दशकों तक कांग्रेस को राष्ट्रीय पहचान दी, उनकी प्रतिमा हटने पर स्थानीय नेतृत्व की खामोशी कई सवाल खड़े कर रही है।
नगर निगम और मेयर का पक्ष विकास, ट्रैफिक प्रबंधन और अतिक्रमण हटाने की आवश्यकता पर आधारित है। उनका कहना है कि शहर को सुव्यवस्थित और आधुनिक स्वरूप देने के लिए यह कदम जरूरी था। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि यदि विकास ही प्राथमिकता थी तो प्रतिमा को सम्मानपूर्वक किसी अन्य प्रमुख स्थल पर स्थापित करने की स्पष्ट योजना पहले सामने लाई जानी चाहिए थी। लोकतंत्र में प्रतिमाएं केवल धातु या पत्थर की संरचनाएं नहीं होतीं, वे इतिहास की जीवित स्मृतियां होती हैं, जिनसे पीढ़ियां प्रेरणा लेती हैं।
त्रिशूल का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी कम नहीं है। सनातन परंपरा में यह भगवान शिव का आयुध है और सृजन, संरक्षण तथा संहार की त्रिवेणी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। यह शक्ति, संतुलन और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन बहस इस बात पर केंद्रित है कि क्या एक धार्मिक प्रतीक की स्थापना के लिए ऐतिहासिक-राजनीतिक प्रतीक को हटाना आवश्यक था, या दोनों के बीच संतुलन बनाकर शहर की पहचान को समावेशी रखा जा सकता था।
यह पूरा विवाद अब केवल एक चौराहे तक सीमित नहीं रहा। यह राजनीतिक प्रतिबद्धता, वैचारिक स्पष्टता और लोकतांत्रिक संवाद की परीक्षा बन चुका है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि कांग्रेस नेतृत्व अपनी स्थिति मुखर रूप से रखता है या नहीं, और नगर निगम प्रतिमा के पुनर्स्थापन को लेकर कोई ठोस निर्णय लेता है या नहीं। फिलहाल रुद्रपुर में इतिहास, धर्म और विकास के बीच संतुलन की यह बहस शहर की राजनीति को नई दिशा देने की क्षमता रखती है।
