एनएच-74 घोटाला: कैसे लूटा गया करोड़ों का मुआवजा, कौन था असली मास्टरमाइंड, क्यों सोता रहा सिस्टम — 13.89 करोड़ की कुर्की से फिर बेनकाब अफसरशाही और सरकारों की जवाबदेही।

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एनएच-74 घोटाला: कैसे लूटा गया करोड़ों का मुआवजा, कौन था असली मास्टरमाइंड, क्यों सोता रहा सिस्टम — 13.89 करोड़ की कुर्की से फिर बेनकाब अफसरशाही और सरकारों की जवाबदेही।


उत्तराखंड की प्रशासनिक व्यवस्था को भीतर तक हिला देने वाला एनएच-74 घोटाला एक बार फिर सुर्खियों में है और इस बार वजह है प्रवर्तन निदेशालय की ताजा कार्रवाई। ईडी ने चार किसानों की लगभग 13.89 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्तियां धन शोधन निवारण अधिनियम 2002 के तहत अस्थायी रूप से कुर्क कर दी हैं। लेकिन असली सवाल केवल कुर्की का नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र का है जिसके रहते करोड़ों रुपये का खेल वर्षों तक चलता रहा।

मामला वर्ष 2016 में उजागर हुआ जब एनएच-74 चौड़ीकरण के लिए भूमि अधिग्रहण में मुआवजा वितरण को लेकर भारी अनियमितताएं सामने आईं। आरोप है कि राजस्व अभिलेखों में हेरफेर कर कृषि भूमि को गैर-कृषि दर्शाने के लिए धारा 143 के आदेश बैक डेट में जारी कराए गए, जिससे अधिग्रहण के समय अधिक दर से मुआवजा दिया गया। जांच में सामने आया कि करीब 26 करोड़ रुपये से अधिक की अतिरिक्त धनराशि का भुगतान हुआ। यह केवल कागजी गलती नहीं थी, बल्कि सुनियोजित तरीके से की गई प्रक्रिया थी जिसमें राजस्व तंत्र, बिचौलियों और लाभार्थियों की कथित मिलीभगत की बात सामने आई।

10 मार्च 2017 को मुकदमा दर्ज हुआ, जांच आगे बढ़ी, सात पीसीएस अधिकारियों सहित कई अफसर निलंबित हुए, 30 से अधिक लोग जेल भेजे गए और आईएएस स्तर तक की भूमिका की जांच की गई। ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल से पड़ताल शुरू की और अब 13.89 करोड़ की संपत्तियों को कुर्क किया है। आरोप है कि अतिरिक्त मुआवजे की रकम से संपत्तियां खरीदी गईं, बैंक खातों के जरिए धन को इधर-उधर स्थानांतरित किया गया और रिश्तेदारों के खातों में ट्रांजैक्शन किए गए।

फिर भी वर्षों बाद अंतिम सजा क्यों नहीं हुई, यह सबसे बड़ा प्रश्न है। क्या कानूनी पेच, क्या विभागीय ढील, या क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी इस देरी की वजह है। इतना बड़ा घोटाला बिना सिस्टम की आंखों के सामने हुए कैसे संभव हुआ, किस स्तर पर निगरानी विफल रही और क्या जिम्मेदारी केवल निचले स्तर तक सीमित रहेगी या शीर्ष अफसरशाही और उस समय की सरकारों तक भी जवाबदेही तय होगी, यह बहस फिर तेज हो गई है।

इस घोटाले ने प्रदेश की अर्थव्यवस्था को सीधा नुकसान पहुंचाया। सार्वजनिक धन, जो विकास परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे में लगना था, विवादों और मुकदमों में उलझ गया। इससे शासन की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर भी गहरा असर पड़ा। आज जब ईडी की कार्रवाई ने एक बार फिर इस प्रकरण को जीवित कर दिया है, तो प्रदेश की जनता जवाब चाहती है कि क्या इस बार दोषियों तक सजा पहुंचेगी या फिर एनएच-74 घोटाले का यह जिन्न समय-समय पर बाहर आकर सिस्टम को आईना दिखाता रहेगा।