नगर निगम, प्रशासन और मेयर की कुंठित मानसिकता? शिलापट से विधायक का नाम गायब, क्या मुख्य नगर आयुक्त प्रोटोकॉल भूल गईं — पीले रंग की परत में छिपा त्रिशूल चौक का सियासी संदेश।

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  1. नगर निगम, प्रशासन और मेयर की कुंठित मानसिकता? शिलापट से विधायक का नाम गायब, क्या मुख्य नगर आयुक्त प्रोटोकॉल भूल गईं — पीले रंग की परत में छिपा त्रिशूल चौक का सियासी संदेश।

महेंद्र पाल ‘मौर्य’   “समाचार इंडिया 1”                               रुद्रपुर -रुद्रपुर के त्रिशूल चौक पर भोलेनाथ के त्रिशूल के शुभारंभ से पहले लगाया गया शिलापट अब महज एक औपचारिक पत्थर नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है। शिलापट पर स्थानीय विधायक Shiv Arora का नाम न होना सीधे-सीधे सवाल खड़े करता है। कार्यक्रम से पहले जैसे ही शिलापट की तस्वीरें सार्वजनिक हुईं, शहर की राजनीति में हलचल मच गई और इसे सामान्य प्रशासनिक चूक के बजाय एक सोचे-समझे राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जाने लगा।


चर्चाओं का दायरा तेजी से नगर निगम और प्रशासन तक फैल गया। सवाल उठने लगे कि क्या नगर निगम ने प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया या फिर किसी स्तर पर जानबूझकर विधायक का नाम शामिल नहीं किया गया। मुख्य नगर आयुक्त की भूमिका पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं—क्या उन्होंने प्रोटोकॉल का पाठ भुला दिया या फिर किसी दबाव में निर्णय लिया गया। मेयर विकास शर्मा को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में कयासों का दौर जारी है, हालांकि अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

घटनाक्रम ने उस समय और तूल पकड़ लिया जब जानकारी सामने आई कि कार्यक्रम के अगले ही दिन शिलापट पर पीला पेंट चढ़ा दिया गया। यह जल्दबाजी संदेह को और गहरा करती है। यदि यह केवल तकनीकी गलती थी तो उसे सार्वजनिक रूप से सुधारने के बजाय ढकने की जरूरत क्यों पड़ी, और यदि नाम जानबूझकर छोड़ा गया था तो जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी—ये सवाल अब आम चर्चा का हिस्सा बन चुके हैं।

स्थानीय स्तर पर इस पूरे प्रकरण को Bharatiya Janata Party की संभावित अंदरूनी खींचतान से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सार्वजनिक कार्यक्रमों के शिलापट पर जनप्रतिनिधियों के नामों का उल्लेख स्थापित परंपरा और प्रोटोकॉल का अभिन्न हिस्सा होता है। ऐसे में नाम का गायब होना केवल औपचारिक चूक नहीं, बल्कि संगठन के भीतर शक्ति संतुलन और संदेश का संकेत भी माना जा रहा है। चर्चा यह भी है कि मामला पार्टी नेतृत्व तक पहुंचा, जिसके बाद प्रशासन ने तेजी से ‘डैमेज कंट्रोल’ की राह चुनी।

जिला प्रशासन, विशेषकर DM Udham Singh Nagar, अब तक इस पूरे मामले पर मौन साधे हुए है। न कोई स्पष्ट स्पष्टीकरण दिया गया है और न ही किसी स्तर पर जिम्मेदारी तय होने की बात सामने आई है। इस चुप्पी ने सियासी अटकलों को और हवा दे दी है।

मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami के नेतृत्व में संगठनात्मक एकजुटता और अनुशासन की बात लगातार कही जाती रही है, लेकिन त्रिशूल चौक का यह प्रकरण उन दावों को चुनौती देता नजर आता है। चुनावी माहौल की आहट के बीच यह विवाद स्थानीय घटना से आगे बढ़कर व्यापक राजनीतिक संदेश का रूप ले चुका है।

फिलहाल शिलापट पर चढ़ा पीला रंग विवाद को ढकता जरूर दिखाई देता है, लेकिन उससे जुड़े सवाल अब भी कायम हैं। यह प्रशासनिक चूक थी, व्यक्तिगत कुंठा का परिणाम या फिर सियासी रणनीति का हिस्सा—इसका आधिकारिक जवाब भले ही न मिले, पर रुद्रपुर की राजनीति में यह मामला लंबे समय तक चर्चा में रहने वाला है।