

“ईद-उल-अजहा पर देशभर में अकीदत का माहौल: कुर्बानी के त्योहार के बीच सरकार के रवैये और व्यवस्थाओं पर भी उठी चर्चा”


देशभर में ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का त्योहार पूरी अकीदत, उत्साह और धार्मिक परंपराओं के साथ मनाया गया। सुबह से ही मस्जिदों और ईदगाहों में नमाजियों की भारी भीड़ उमड़ी और लोगों ने अमन, भाईचारे और मुल्क की तरक्की के लिए दुआएं मांगीं। मुस्लिम समाज में इस पर्व को लेकर कई दिनों से तैयारियां चल रही थीं और आखिरकार त्योहार के दिन बाजारों, गलियों और मस्जिदों में रौनक देखने को मिली। इस बीच कई स्थानों पर प्रशासन और सरकार की व्यवस्थाओं तथा मुस्लिम त्योहारों को लेकर अपनाए जा रहे रवैये को लेकर भी चर्चाएं होती रहीं।
ईद-उल-अजहा इस्लाम धर्म का सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक माना जाता है। इसे कुर्बानी का त्योहार भी कहा जाता है। इस पर्व का इतिहास इस्लाम के महान पैगंबर हज़रत इब्राहिम और उनके बेटे हज़रत इस्माइल की उस ऐतिहासिक घटना से जुड़ा है, जिसने त्याग और अल्लाह के प्रति समर्पण की मिसाल कायम की।
इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार अल्लाह ने हज़रत इब्राहिम की परीक्षा लेने के लिए उन्हें सपने में अपनी सबसे प्यारी चीज़ कुर्बान करने का आदेश दिया। हज़रत इब्राहिम के लिए सबसे प्रिय उनके बेटे हज़रत इस्माइल थे। अल्लाह के हुक्म को सर्वोपरि मानते हुए उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का फैसला कर लिया। जब उन्होंने अपने बेटे को अल्लाह की राह में कुर्बान करने की तैयारी की तो हज़रत इस्माइल ने भी बिना किसी डर और हिचकिचाहट के अपने पिता का साथ दिया और अल्लाह की रज़ा में खुद को पेश कर दिया।
बताया जाता है कि जैसे ही हज़रत इब्राहिम ने छुरी चलाई, उसी समय अल्लाह ने फरिश्ते जिब्रील को भेजा और हज़रत इस्माइल की जगह एक दुम्बा रख दिया गया। जब हज़रत इब्राहिम ने अपनी आंखों से पट्टी हटाई तो उनका बेटा सुरक्षित खड़ा था और उसकी जगह जानवर की कुर्बानी हो चुकी थी। अल्लाह ने उनकी इस निष्ठा और समर्पण को इतनी पसंद किया कि इस घटना को हमेशा के लिए अमर कर दिया गया। तभी से दुनिया भर के मुसलमान हर साल ईद-उल-अजहा पर कुर्बानी की परंपरा निभाते हैं।
इस त्योहार का असली उद्देश्य केवल जानवर की कुर्बानी देना नहीं बल्कि अपने अंदर मौजूद लालच, घमंड, नफरत और बुराइयों का त्याग करना भी माना जाता है। इस्लाम में कुर्बानी इंसान को यह सीख देती है कि वह जरूरत पड़ने पर अपनी सबसे प्रिय चीज़ भी अल्लाह की राह में छोड़ने का जज्बा रखे। यही वजह है कि इस पर्व को त्याग, इंसानियत और भाईचारे का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।
ईद-उल-अजहा के मौके पर कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटने की परंपरा भी निभाई जाती है। एक हिस्सा अपने परिवार के लिए रखा जाता है, दूसरा रिश्तेदारों और दोस्तों में बांटा जाता है और तीसरा हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों को दिया जाता है ताकि समाज में कोई भी व्यक्ति भूखा न रहे। यही परंपरा इस त्योहार को सामाजिक समानता और इंसानियत का संदेश देने वाला पर्व बनाती है।
यह त्योहार इस्लामिक कैलेंडर के आखिरी महीने जिल-हिज्जा की 10 तारीख को मनाया जाता है और इसी दौरान दुनिया भर के मुसलमान मक्का में हज यात्रा भी पूरी करते हैं। हज इस्लाम के पांच प्रमुख स्तंभों में शामिल है और ईद-उल-अजहा उसी पवित्र समय में मनाई जाती है।
देशभर में ईद के मौके पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन अलर्ट मोड पर दिखाई दिया। कई राज्यों में पुलिस और प्रशासन ने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए विशेष इंतजाम किए। वहीं मुस्लिम समाज के लोगों ने उम्मीद जताई कि सभी धार्मिक त्योहारों की तरह ईद को भी सम्मान और सौहार्द के वातावरण में मनाने की परंपरा आगे भी कायम रहेगी। त्योहार के दिन लोगों ने एक-दूसरे को गले लगाकर मुबारकबाद दी और देश में अमन-चैन, भाईचारे और खुशहाली की दुआ मांगी।
