

उत्तराखंड का सबसे बड़ा इंडस्ट्रियल एक्सपो या सिर्फ प्रचार का शोर? यूपी सीमा पर सिमटा आयोजन, जनप्रतिनिधियों की बेरुखी ने खड़े किए बड़े सवाल
रुद्रपुर । उत्तराखंड के सबसे बड़े औद्योगिक आयोजन के रूप में प्रचारित किए जा रहे 35वें रुद्रपुर इंडस्ट्रियल एग्जीबिशन-2026 का शुभारंभ बुधवार को आर्क होटल में हुआ, लेकिन उद्घाटन के साथ ही यह आयोजन उपलब्धियों से ज्यादा सवालों के घेरे में आ गया। आयोजकों ने 150 से अधिक स्टॉल, 1200 उद्योग प्रतिनिधियों और 5000 से अधिक आगंतुकों के आने का दावा किया, लेकिन पहले ही दिन कार्यक्रम को लेकर उद्योग जगत और राजनीतिक गलियारों में कई चर्चाएं शुरू हो गईं। सबसे बड़ी चर्चा इस बात की रही कि उत्तराखंड का सबसे बड़ा औद्योगिक आयोजन कहे जाने के बावजूद इसकी गूंज पूरे प्रदेश में नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे क्षेत्र तक ही अधिक सुनाई दी।
उद्योग जगत में यह सवाल लगातार उठता रहा कि यदि यह आयोजन वास्तव में उत्तराखंड के औद्योगिक विकास की दिशा तय करने वाला मंच है तो प्रदेश सरकार के वरिष्ठ प्रतिनिधियों, सांसदों और अन्य जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी क्यों नहीं दिखी। उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में केवल रुद्रपुर विधायक शिव अरोड़ा ही नजर आए। क्षेत्र के सांसद सहित कई प्रमुख जनप्रतिनिधियों की अनुपस्थिति पूरे आयोजन पर चर्चा का विषय बनी रही। लोगों का कहना था कि जिस आयोजन को प्रदेश का सबसे बड़ा औद्योगिक महाकुंभ बताया जा रहा है, उसमें राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर अपेक्षित सहभागिता दिखाई नहीं दी।
आयोजकों की ओर से दावा किया गया कि देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी कंपनियां आधुनिक मशीनरी, सीएनसी तकनीक, रोबोटिक्स, ऑटोमेशन, वेल्डिंग सिस्टम, औद्योगिक उपकरण और नई तकनीकों का प्रदर्शन कर रही हैं। तकनीकी सेमिनारों और बिजनेस नेटवर्किंग के जरिए उद्योगों को नए अवसर मिलने की भी बात कही गई। लेकिन स्थानीय उद्यमियों का कहना है कि ऐसे दावे हर वर्ष किए जाते हैं, जबकि आज तक यह सार्वजनिक नहीं किया गया कि पिछली प्रदर्शनियों के बाद कितने नए उद्योग स्थापित हुए, कितने करोड़ रुपये का निवेश आया, कितने युवाओं को रोजगार मिला और कितनी स्थानीय इकाइयों ने वास्तव में नई तकनीक अपनाई।
स्थानीय एमएसएमई संचालकों का कहना है कि प्रदर्शनी में बड़ी कंपनियों की चमक तो दिखाई देती है, लेकिन छोटे और मध्यम उद्योगों के सामने आज भी वही पुरानी समस्याएं खड़ी हैं। बिजली की लगातार बढ़ती लागत, महंगा कच्चा माल, बैंकों से ऋण लेने में कठिनाई, कुशल श्रमिकों की कमी और बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियों पर गंभीर चर्चा कम और आधुनिक मशीनों के प्रदर्शन पर अधिक जोर दिखाई देता है। उनका कहना है कि लाखों और करोड़ों रुपये की मशीनों का प्रदर्शन उन छोटी इकाइयों के लिए कितना उपयोगी है, जो रोजमर्रा के संचालन की लागत निकालने के लिए संघर्ष कर रही हैं, यह भी बड़ा सवाल है।
आयोजन में इंडस्ट्री 4.0, ऑटोमेशन और आधुनिक उत्पादन प्रणाली जैसे विषयों पर सेमिनार आयोजित किए जा रहे हैं, लेकिन उद्योग जगत की नजर इस बात पर है कि इन चर्चाओं का वास्तविक परिणाम क्या निकलता है। क्या स्थानीय उद्योगों को नए ऑर्डर मिलेंगे, क्या नए निवेश समझौते होंगे, क्या रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और क्या छोटे उद्योगों को तकनीकी सहायता मिलेगी, इसका जवाब आयोजन समाप्त होने के बाद ही मिल सकेगा।
इस बीच पूरे आयोजन की सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर रही कि उत्तराखंड के औद्योगिक विकास का चेहरा बताए जा रहे इस कार्यक्रम की चमक प्रदेशभर में नहीं दिखी। उद्योग जगत में यह सवाल भी उठता रहा कि यदि यह आयोजन वास्तव में उत्तराखंड की औद्योगिक ताकत का प्रतीक है तो इसकी पहचान और प्रभाव पूरे प्रदेश में क्यों दिखाई नहीं देता। कई लोगों ने इसे उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे क्षेत्र तक सीमित आयोजन बताते हुए कहा कि बड़े दावों के बीच जमीनी प्रभाव अभी भी स्पष्ट नजर नहीं आ रहा है।
फिलहाल आयोजन अपने पहले दिन से ही आधुनिक मशीनों से अधिक बड़े दावों, जनप्रतिनिधियों की दूरी और वास्तविक उपलब्धियों को लेकर उठ रहे सवालों के कारण चर्चा में है। अब सभी की नजर तीन दिन बाद सामने आने वाले परिणामों पर रहेगी। यदि इस प्रदर्शनी से स्थानीय उद्योगों को नए निवेश, नई तकनीक, नए बाजार और रोजगार के अवसर मिलते हैं तो आयोजन अपने उद्देश्य में सफल माना जाएगा, लेकिन यदि परिणाम केवल प्रचार तक सीमित रहे तो यह सवाल और भी मजबूत होगा कि क्या ऐसे आयोजन वास्तव में उद्योगों को आगे बढ़ा रहे हैं या फिर केवल भव्य मंच, बड़े दावे और प्रचार तक सिमटकर रह गए हैं।


