

जब जनता डूब रही थी तब कौन था साथ? अब पुल पर श्रेय की जंग क्यों?



किच्छा विधानसभा क्षेत्र के रुद्रपुर वार्ड नंबर–1 फुलसुंगा बैगल नदी का वही इलाका, जहां कुछ समय पहले लोग पानी में घिरे हुए थे, घरों में घुटनों तक पानी था, सामान बह रहा था और परिवार अपनी जमा-पूंजी बचाने में लगे थे, आज राजनीतिक बयानबाज़ी का केंद्र बन गया है। तब चीखें थीं,
कीचड़ था, बर्बादी थी—लेकिन बड़े दावों वाले चेहरे नजर नहीं आए। आज ₹174.81 लाख की प्रशासनिक स्वीकृति और ₹104.89 लाख की पहली किस्त जारी होते ही श्रेय लेने की होड़ मच गई है।
किच्छा के विधायक तिलकराज बेहड़ 
और रुद्रपुर के मेयर विकास शर्मा
दोनों अपने-अपने दावे पेश कर रहे हैं, मानो जनता की पीड़ा नहीं, बल्कि उपलब्धि का मंच तैयार हो। सवाल सीधा है—जब लोग पानी में डूब रहे थे, तब हाल पूछने कौन आया था? जब मुआवजे के नाम पर कुछ हजार के चेक थमाए जा रहे थे और राहत पर सवाल उठ रहे थे, तब सिस्टम की संवेदनशीलता कहाँ थी?
अब जब सरकारी खजाने से लाखों की राशि स्वीकृत हुई है, तब प्रेस नोट, फोटो और बयानबाज़ी की बाढ़ आ गई है। क्या विकास का अर्थ सिर्फ शिलापट्ट पर नाम दर्ज कराना रह गया है? क्या जनता का दर्द सिर्फ फाइलों के आगे बढ़ने तक ही महत्वपूर्ण है?
स्थानीय लोग खुलकर कह रहे हैं कि उन्हें यह दिखावटी सक्रियता नहीं, समय पर ठोस कार्रवाई चाहिए थी। आपदा के समय खामोशी और बाद में श्रेय की राजनीति—यही दो तस्वीरें आज आमजन के सामने हैं। जनता सब देख रही है। वह जानती है कि सच्चा प्रतिनिधि वही होता है जो संकट में साथ खड़ा हो, न कि स्वीकृति के बाद मंच पर आगे खड़ा हो। पुल बने, मजबूत बने, समय पर बने—लेकिन याद रहे, इतिहास श्रेय नहीं, संवेदनशीलता लिखता
