

आस्था के नाम पर करोड़ों का खेल?” उत्तराखंड हाईकोर्ट की सख्ती के बाद कैंची धाम ट्रस्ट कटघरे में।


उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित बाबा नीम करौली के प्रसिद्ध कैंची धाम में चढ़ावे और ट्रस्ट संचालन को लेकर उठे सवाल अब गंभीर कानूनी मोड़ ले चुके हैं। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक भक्त की शिकायत पर स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार, डीएम नैनीताल, एसडीएम और मंदिर ट्रस्ट से चार सप्ताह में जवाब मांगा है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि मामला केवल अफवाह या आरोपों तक सीमित नहीं, बल्कि करोड़ों के लेन-देन और पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर विषय है।
याचिका में कहा गया है कि हर साल यहां करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है, लेकिन उसका पूरा हिसाब सार्वजनिक रूप से सामने नहीं रखा जाता। ट्रस्ट का पंजीकरण, ट्रस्टियों की संख्या, उनकी नियुक्ति प्रक्रिया, कार्यालय का स्पष्ट पता और संपत्ति का ब्यौरा जैसी मूलभूत जानकारी भी आम लोगों को सहज उपलब्ध नहीं है। सवाल यह भी है कि जब लाखों की संख्या में देश-विदेश से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और नकद दान, दानपात्र, विशेष पूजा की पर्चियां, बैंक खातों में ट्रांसफर और बड़े आयोजनों के दौरान अलग व्यवस्था से धन एकत्र होता है, तो उसका ऑडिट और सार्वजनिक लेखा-जोखा कहां है?
स्थापना दिवस और वार्षिक मेले के समय यहां अपार भीड़ उमड़ती है। ऐसे में करोड़ों का चढ़ावा होना अस्वाभाविक नहीं, लेकिन पारदर्शिता का अभाव संदेह को जन्म देता है। यदि सब कुछ नियमों के तहत है तो आय-व्यय की वार्षिक रिपोर्ट, ऑडिट स्टेटमेंट और ट्रस्ट संरचना सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती? विदेशी श्रद्धालुओं से आने वाले दान के संदर्भ में एफसीआरए और अन्य वित्तीय नियमों के पालन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि जिस प्रकार बदरी-केदारनाथ और जागेश्वर धाम जैसे मंदिर सीमित सरकारी निगरानी में संचालित होते हैं, उसी तरह यहां भी जवाबदेही तय हो। भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 के तहत पंजीकरण और वित्तीय पारदर्शिता अनिवार्य मानी जाती है। ऐसे में यदि जानकारी सार्वजनिक नहीं है तो यह केवल प्रशासनिक चूक है या कुछ छिपाने की कोशिश?
कैंची धाम, जो नैनीताल से लगभग 30 से 45 मिनट और हल्द्वानी से करीब दो घंटे की दूरी पर स्थित है, आस्था का बड़ा केंद्र है। लेकिन आस्था के साथ जवाबदेही भी जुड़ी होती है। भक्तों का सवाल सीधा है—चढ़ावे का पैसा कहां और कैसे खर्च हो रहा है? क्या मंदिर प्रबंधन पूरी पारदर्शिता के साथ काम कर रहा है या फिर श्रद्धा के सागर में जवाबदेही डूब रही है?
अब सबकी निगाहें अदालत की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। हाईकोर्ट की सख्ती ने साफ कर दिया है कि आस्था के नाम पर किसी भी तरह की वित्तीय अपारदर्शिता को अनदेखा नहीं किया जाएगा। यदि सब कुछ सही है तो ट्रस्ट के पास जवाब देने का सुनहरा मौका है—और अगर नहीं, तो आने वाले दिन इस धाम की व्यवस्था में बड़े बदलाव का संकेत दे सकते हैं।
