

रुद्रपुर में फिर जली लोहड़ी की अग्नि: बलवंत अरोड़ा ‘बल्लू’ की अपील से एकजुट हुआ पंजाबी समाज, सांस्कृतिक पुनर्जागरण की ओर बढ़ा शहर।
रिपोर्ट- महेंद्र पाल मौर्या ” समाचार इंडिया 1 ”
रुद्रपुर – रुद्रपुर शहर, जिसे तराई का प्रमुख सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र माना जाता है, बीते कुछ वर्षों से सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। इसी शहर के एक सजग नागरिक, समाजसेवी और पूर्व में रुद्रपुर व्यापार मंडल के अध्यक्ष रहे बलवंत अरोड़ा उर्फ ‘बल्लू’ लंबे समय से शहर की समस्याओं को लेकर चिंतित और सक्रिय रहे हैं। नशे और जुए की गिरफ्त में फिसलते युवा, ओवरसीज के नाम पर आम लोगों से हो रही ठगी, सामाजिक बिखराव और विशेष रूप से रुद्रपुर के पंजाबी समाज की कमजोर होती सांस्कृतिक एकता जैसे मुद्दों को उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं, बल्कि विभिन्न मीडिया माध्यमों और चैनलों के जरिए भी मजबूती से उठाया।
बलवंत अरोड़ा ‘बल्लू’ का मानना रहा है कि किसी भी शहर की असली ताकत उसकी सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक पहचान में निहित होती है। इसी सोच के तहत उन्होंने रुद्रपुर में वर्षों से चली आ रही लोहड़ी और बैसाखी जैसे पारंपरिक पंजाबी पर्वों के आयोजन बंद होने पर गहरी चिंता व्यक्त की। रुद्रपुर के गांधी पार्क में लगने वाला ऐतिहासिक लोहड़ी मेला कभी पंजाबी समाज ही नहीं, बल्कि सर्व समाज को जोड़ने वाला एक बड़ा सामाजिक उत्सव हुआ करता था। उस मेले में शहर के हर वर्ग, हर समुदाय और हर उम्र के लोग शामिल होते थे, जिससे आपसी भाईचारा, सांस्कृतिक समन्वय और मानवीय एकता की मिसाल कायम होती थी। लेकिन बीते चार से पांच वर्षों से इन आयोजनों के ठप पड़ जाने से पंजाबी समाज में यह सवाल उठने लगा था कि क्या रुद्रपुर में उनकी सांस्कृतिक परंपराएं धीरे-धीरे सिमटती जा रही हैं।
इसी चिंता को बलवंत अरोड़ा ‘बल्लू’ ने एक भावुक और सार्थक अपील के माध्यम से सार्वजनिक रूप से सामने रखा। जिसने पूरे पंजाबी समाज के साथ-साथ शहर के प्रबुद्ध नागरिकों और जनप्रतिनिधियों को आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया। यदि समाज अपनी परंपराओं और उत्सवों को ही भूल जाएगा, तो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से कैसे जोड़ा जाएगा। इस अपील का व्यापक असर देखने को मिला और पंजाबी समाज में एक बार फिर उत्साह, उमंग और अपनी पहचान को बचाने का संकल्प जाग उठा।
इस सकारात्मक पहल का नतीजा यह रहा कि रुद्रपुर के ओमेक्स क्षेत्र में लोहड़ी मेले का किया जा रहा है। जहां समाज के लोगों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों, लोकगीतों, अग्नि प्रज्ज्वलन और उल्लास के साथ लोहड़ी पर्व मनाया। लंबे समय बाद हुए इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि यदि समाज एकजुट हो, तो बिखरती परंपराओं को फिर से संजोया जा सकता है। इस आयोजन को केवल एक पर्व के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है।
वहीं आगामी 13 तारीख को रुद्रपुर के सिटी क्लब में भी भव्य लोहड़ी मेले का आयोजन प्रस्तावित है। इस आयोजन को लेकर बलवंत अरोड़ा ‘बल्लू’ ने विशेष खुशी जाहिर की और कहा कि शहर के जनप्रतिनिधियों और समाज के जिम्मेदार लोगों ने उनकी अपील को सकारात्मक रूप से स्वीकार किया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में राजनीति से ऊपर उठकर पूरा शहर एक सामाजिक सूत्र में बंधेगा और सांस्कृतिक, वैचारिक व मानवीय एकता के साथ रुद्रपुर के विकास में अपनी भूमिका निभाएगा।
रुद्रपुर में लोहड़ी मेले की वापसी केवल एक पर्व की वापसी नहीं है, बल्कि यह उस सांस्कृतिक चेतना का पुनर्जन्म है, जिसने कभी गांधी पार्क जैसे सार्वजनिक स्थलों को सामाजिक समरसता के केंद्र के रूप में स्थापित किया था। आज जब समाज नशा, भटकाव और बिखराव जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब ऐसे आयोजन युवाओं को अपनी संस्कृति से जोड़ने, परिवारों को एक मंच पर लाने और सर्व समाज के बीच आपसी विश्वास को मजबूत करने का काम करते हैं।
कुल मिलाकर, बलवंत अरोड़ा ‘बल्लू’ की पहल और उनकी अपील से उपजा यह आंदोलन रुद्रपुर के सामाजिक इतिहास में एक सकारात्मक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। लोहड़ी की जलती अग्नि के साथ यह उम्मीद भी प्रज्ज्वलित हुई है कि रुद्रपुर फिर से सांस्कृतिक उत्सवों, सामाजिक एकता और सामूहिक चेतना का जीवंत उदाहरण



