

कुमाऊँ के नगर निगमों में लोकतंत्र का गला घोंटा गया


कानून दरकिनार, मेयरों की निरंकुशता में पार्षद बने शोपीस
काशीपुर।
कुमाऊँ मंडल के पाँचों नगर निगमों में लोकतांत्रिक व्यवस्था आज केवल फाइलों और कानून की किताबों तक सीमित होकर रह गई है। जमीनी हकीकत यह है कि नगर निगम अधिनियम के स्पष्ट, अनिवार्य और बाध्यकारी प्रावधानों को खुलेआम ताक पर रखकर नगर निगमों का संचालन किया जा रहा है। न तो नियमित बोर्ड बैठकों का आयोजन हो रहा है और न ही जनता द्वारा निर्वाचित पार्षदों को वह भूमिका और अधिकार मिल पा रहे हैं, जो स्थानीय स्वशासन की आत्मा माने जाते हैं। सामूहिक निर्णय की व्यवस्था को दरकिनार कर नगर निगमों को महापौर केंद्रित सत्ता के रूप में चलाया जा रहा है, जिससे लोकतंत्र की बुनियाद हिलती नजर आ रही है।
इस गंभीर और चिंताजनक स्थिति का खुलासा काशीपुर निवासी सूचना अधिकार कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता नदीम उद्दीन द्वारा सूचना अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त आधिकारिक दस्तावेजों से हुआ है। नदीम उद्दीन ने कुमाऊँ के सभी नगर निगमों से 1 जनवरी 2025 से लेकर सूचना उपलब्ध कराने की तिथि तक आयोजित निगम और बोर्ड बैठकों की जानकारी उनके कार्यवृत्त सहित मांगी थी। नगर निगमों के लोक सूचना अधिकारियों द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचनाओं के विश्लेषण से यह तथ्य निर्विवाद रूप से सामने आया है कि कुमाऊँ का कोई भी नगर निगम नगर निगम अधिनियम के अनुसार वर्ष में न्यूनतम छह बैठकों की अनिवार्य शर्त पूरी नहीं कर पाया।
काशीपुर नगर निगम की स्थिति लोकतंत्र की बदहाली की स्पष्ट तस्वीर पेश करती है। नगर निगम काशीपुर के लोक सूचना अधिकारी द्वारा 22 नवंबर 2025 को दी गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2025 में केवल दो बोर्ड बैठकें आयोजित की गईं। पहली बैठक 5 फरवरी 2025 को महापौर दीपक बाली की अध्यक्षता में हुई, जिसमें 40 पार्षद उपस्थित रहे और केवल तीन प्रस्ताव पारित किए गए। दूसरी बैठक 3 मार्च 2025 को आयोजित की गई, जिसमें 39 पार्षदों की उपस्थिति में 24 प्रस्ताव पारित हुए। इसके बाद पूरे वर्ष नगर निगम बोर्ड की एक भी बैठक नहीं हुई, जिससे निगम संचालन की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
रुद्रपुर नगर निगम से प्राप्त सूचना और भी चौंकाने वाली है। यहां कुल तीन बैठकों का उल्लेख किया गया, लेकिन दस्तावेजों में केवल 7 फरवरी और 18 फरवरी 2025 की बैठकों के कार्यवृत्त ही उपलब्ध कराए गए। 7 फरवरी की बैठक में महापौर विकास शर्मा के साथ विधायक शिव अरोरा, विधायक तिलक राज बेहड़ और 40 पार्षद उपस्थित थे, लेकिन इसमें केवल एक प्रस्ताव पारित किया गया। 18 फरवरी की बैठक में भी 39 पार्षदों की उपस्थिति के बावजूद सिर्फ एक विशेष प्रस्ताव पारित हुआ, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या ये बैठकें वास्तविक लोकतांत्रिक विमर्श के लिए थीं या केवल औपचारिकता निभाने के लिए।
हल्द्वानी-काठगोदाम नगर निगम की स्थिति कानून की खुली अवहेलना का उदाहरण बनकर सामने आई है। नगर निगम द्वारा वर्ष 2025 में केवल एक ही बोर्ड बैठक का रिकॉर्ड उपलब्ध कराया गया। 26 मार्च 2025 को महापौर गजराम बिष्ट की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में 56 पार्षद उपस्थित रहे और 11 विशेष प्रस्ताव पारित किए गए, लेकिन पूरे वर्ष में केवल एक बैठक होना नगर निगम अधिनियम की आत्मा के साथ सीधा खिलवाड़ है।
अल्मोड़ा नगर निगम में वर्ष 2025 के दौरान तीन बोर्ड बैठकें आयोजित की गईं। 7 फरवरी, 29 अप्रैल और 5 अगस्त को हुई इन बैठकों में क्रमशः 44, 63 और 43 प्रस्ताव पारित किए गए। प्रस्तावों की संख्या चाहे जितनी अधिक हो, लेकिन बैठकों की संख्या अधिनियम में निर्धारित न्यूनतम मानक से काफी कम रही, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कानून की पूर्ति के बजाय दिखावे को प्राथमिकता दी गई।
पिथौरागढ़ नगर निगम ने वर्ष 2025 में कुल पाँच बोर्ड बैठकें आयोजित कीं। 6 फरवरी, 22 फरवरी, 10 मार्च, 21 अप्रैल और 3 सितंबर को हुई इन बैठकों में कुल 43 प्रस्ताव पारित किए गए। इसके बावजूद यह निगम भी अधिनियम द्वारा अनिवार्य रूप से निर्धारित छह बैठकों की शर्त को पूरा नहीं कर पाया, जो सीधे तौर पर कानूनी उल्लंघन की श्रेणी में आता है।
इस पूरे मामले पर अधिवक्ता नदीम उद्दीन ने कहा कि नगर निगम अधिनियम की धारा 88 स्पष्ट रूप से प्रत्येक नगर निगम में वर्ष में कम से कम छह अधिवेशन अनिवार्य करती है और दो अधिवेशनों के बीच का अंतर दो माह से अधिक नहीं हो सकता। धारा 91 के तहत प्रत्येक बैठक की लिखित सूचना पार्षदों को कम से कम 96 घंटे पूर्व दिया जाना आवश्यक है, जबकि धारा 98 पार्षदों को नगर निगम से जुड़े किसी भी विषय पर प्रश्न पूछने और जवाब मांगने का वैधानिक अधिकार देती है।
नदीम उद्दीन का कहना है कि कुमाऊँ के सभी नगर निगमों में इन कानूनी प्रावधानों की लगातार और सुनियोजित अनदेखी की जा रही है। इसका सीधा असर पार्षदों के अधिकारों, जनता की भागीदारी और स्थानीय लोकतंत्र की मजबूती पर पड़ रहा है। उन्होंने इसे नगर निगमों में लोकतांत्रिक व्यवस्था के क्षरण का गंभीर और खतरनाक संकेत बताते हुए शासन और प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप, जवाबदेही तय करने और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।
