दौलत और शोहरत के मोह में औलाद नहीं कमा पाए तिलक राज बेहड़, सत्ता तो साधी पर संस्कार हार गए, बेटे ने चखाया राजनीति का सबसे कड़वा स्वाद।

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दौलत और शोहरत के मोह में औलाद नहीं कमा पाए तिलक राज बेहड़, सत्ता तो साधी पर संस्कार हार गए, बेटे ने चखाया राजनीति का सबसे कड़वा स्वाद।


रिपोर्ट -महेंद्र पाल मौर्य। “समाचार इंडिया 1” रुद्रपुर।

तराई की राजनीति में दशकों तक दबदबा रखने वाले किच्छा विधायक तिलक राज बेहड़ का राजनीतिक सफर संघर्ष, आक्रामक तेवर और सत्ता की निरंतर मौजूदगी से भरा रहा है। छात्र राजनीति से लेकर विधानसभा तक पहुंचे बेहड़ ने हमेशा खुद को जमीनी नेता और जनसंघर्षों की आवाज़ के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन आज वही नेता अपने राजनीतिक जीवन के सबसे असहज और शर्मनाक दौर से गुजरता दिखाई दे रहा है—जहां सवाल किसी नीति या आंदोलन का नहीं, बल्कि संस्कार और जिम्मेदारी का है।

हालिया घटनाक्रम में बेहड़ का बेटा जिस तरह एक गंभीर विवाद और कथित आपराधिक कृत्य से जुड़ा पाया गया, उसने न केवल एक परिवार को झकझोर दिया बल्कि तिलक राज बेहड़ की वर्षों से गढ़ी गई सार्वजनिक छवि पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए। पहली नजर में मामला बाहरी हमले का प्रतीत हुआ, यही वजह रही कि अस्पताल में समर्थकों की भीड़, राजनीतिक नेताओं की आवाजाही और सत्ता के परिचित दृश्य सामने आए। लेकिन जैसे-जैसे तथ्यों की परतें खुलीं, कहानी ने बिल्कुल अलग मोड़ ले लिया।

यह वही मोड़ था, जहां सत्ता और नैतिकता आमने–सामने खड़ी नजर आई। तिलक राज बेहड़ ने सार्वजनिक रूप से बेटे की कथित करतूतों पर शर्मिंदगी जताई और जनता से माफी मांगी। यह स्वीकारोक्ति अपने आप में बड़ी थी, लेकिन उससे बड़ा सवाल यह उठा कि क्या दशकों की राजनीति, सत्ता और शोहरत के बीच एक नेता अपने ही घर में संस्कारों की बुनियाद मजबूत कर पाया?

राजनीति में बेहड़ ने विरोधियों से लड़ना सीखा, सिस्टम से टकराना सीखा, लेकिन एक पिता के रूप में यह लड़ाई वे हारते दिखे। “दौलत और शोहरत के मोह में औलाद नहीं कमा पाए”—यह पंक्ति आज तिलक राज बेहड़ के पूरे राजनीतिक जीवन पर एक कठोर टिप्पणी बनकर खड़ी है। सत्ता ने उन्हें पहचान दी, प्रभाव दिया, लेकिन वही सत्ता परिवार के भीतर अनुशासन और जिम्मेदारी पैदा नहीं कर सकी।

बेटे से सार्वजनिक रूप से संबंध तोड़ने और उसे उसकी हालत का जिम्मेदार ठहराने का निर्णय भले ही भावनात्मक रूप से कठोर हो, लेकिन यह भी सच है कि यह फैसला तब आया, जब मामला सार्वजनिक हो चुका था और सवाल सत्ता के दायरे से बाहर निकल चुके थे। आलोचकों का कहना है कि यदि यही सख्ती और नैतिकता पहले दिखाई गई होती, तो शायद आज यह दिन नहीं देखना पड़ता।

देश और प्रदेश की राजनीति में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, जहां नेताओं ने अपने बेटों और करीबियों को बचाने के लिए कानून, पुलिस और प्रशासन तक को मोहरा बना दिया। इस पृष्ठभूमि में तिलक राज बेहड़ का कदम अलग जरूर दिखता है, लेकिन यह सवाल भी छोड़ जाता है कि क्या राजनीति केवल सार्वजनिक मंच पर नैतिक होने का नाम है, या निजी जीवन में भी वही कसौटी लागू होती है?

तिलक राज बेहड़ का राजनीतिक करियर भले ही लंबा और प्रभावशाली रहा हो, लेकिन यह प्रकरण उस करियर का सबसे कड़वा अध्याय बन गया है। यह घटना बताती है कि सत्ता के शिखर तक पहुंचना आसान हो सकता है, लेकिन अपने ही घर में जिम्मेदार नागरिक गढ़ पाना सबसे कठिन चुनौती है।

आज तराई की राजनीति में यह चर्चा आम है कि बेहड़ का यह संकट केवल एक पारिवारिक मामला नहीं, बल्कि सत्ता–संस्कृति पर बड़ा सवाल है। सवाल यह नहीं कि एक नेता ने माफी मांगी या नहीं—सवाल यह है कि क्या सत्ता और शोहरत के बीच नैतिकता हमेशा आखिरी पंक्ति में खड़ी रहेगी?

तिलक राज बेहड़ का यह दौर आने वाली राजनीति के लिए एक चेतावनी है—कि अगर नेता अपने घरों में जवाबदेही नहीं बना पाएंगे, तो जनता उन्हें सड़कों और चुनावों में जवाब देने से नहीं चूकेगी।