**संभल में इंसाफ का तबादला! पुलिस पर FIR का आदेश बना ‘अपराध’, CJM हटाए गए — सरकार ने चुन लिया वर्दी का साथ** जब अदालत ने सवाल उठाए, सत्ता असहज हुई — और जज ही बदल दिया गया

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**संभल में इंसाफ का तबादला!

पुलिस पर FIR का आदेश बना ‘अपराध’, CJM हटाए गए — सरकार ने चुन लिया वर्दी का साथ**

जब अदालत ने सवाल उठाए, सत्ता असहज हुई — और जज ही बदल दिया गया

संभल में जो घटित हुआ है, वह किसी एक अदालत, एक जज या एक तबादले की कहानी नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की उस रीढ़ पर पड़ा सवाल है, जिसे संविधान कहा जाता है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विभांशु सुधीर का तबादला अब एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि इसे सत्ता और प्रशासन की ओर से न्यायपालिका को दी गई एक सख्त और खामोश चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। जिला न्यायालय परिसर में वकीलों का उबाल और धरना इस बात का संकेत है कि यह मामला अब न्यायिक दायरे से निकलकर सीधे लोकतांत्रिक चेतना की लड़ाई बन चुका है, जहां इंसाफ खुद इंसाफ मांगने को मजबूर दिखाई दे रहा है।u

पूरा घटनाक्रम संभल हिंसा प्रकरण से जुड़ा है, जिसमें CJM विभांशु सुधीर ने कानून के दायरे में रहते हुए ASP अनुज चौधरी समेत 20 पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का स्पष्ट आदेश दिया था। यह आदेश इसलिए ऐतिहासिक माना गया क्योंकि पहली बार किसी न्यायालय ने हिंसा की घटनाओं में पुलिस की भूमिका को सीधे और स्पष्ट शब्दों में कटघरे में खड़ा किया था। यह वही क्षण था, जब कानून ने सत्ता से सवाल पूछने की हिम्मत दिखाई।

लेकिन यहीं से लोकतंत्र की परीक्षा शुरू हुई और यहीं सरकार का असली चेहरा सामने आने लगा। कानून के राज की दुहाई देने वाले तंत्र ने अदालत के आदेश को मानने से साफ इनकार कर दिया। संभल के पुलिस अधीक्षक ने FIR दर्ज नहीं की। न संविधान की परवाह की गई, न न्यायालय की गरिमा का सम्मान किया गया और न ही अवमानना की किसी कार्रवाई का भय दिखाई दिया। यह सीधा संदेश था कि सत्ता के संरक्षण में खड़ी वर्दी अदालत के आदेशों से ऊपर खुद को समझने लगी है।

इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे घटनाक्रम को और भी भयावह बना दिया। पुलिस अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, न ही अदालत के आदेश की अवहेलना करने वालों से कोई जवाब तलब किया गया। इसके उलट, FIR दर्ज करने का आदेश देने वाले CJM विभांशु सुधीर का तबादला कर दिया गया। इस क्रम ने यह साफ कर दिया कि यहां सवाल यह नहीं है कि तबादला हुआ या नहीं, बल्कि यह है कि कार्रवाई हमेशा नीचे से शुरू क्यों होती है और ऊपर तक कभी क्यों नहीं पहुंचती। संदेश एकदम साफ है—पुलिस पर सवाल उठाओगे तो कुर्सी जाएगी, व्यवस्था पर नहीं।

मामला तब और ज्यादा संदिग्ध हो गया जब नए CJM के रूप में आदित्य सिंह की नियुक्ति की गई। वही आदित्य सिंह, जिन्होंने पहले सदर शाही जामा मस्जिद जैसे अत्यंत संवेदनशील और राजनीतिक रूप से चर्चित मामले में फैसला सुनाया था। वकीलों और कानूनी जानकारों का मानना है कि यह नियुक्ति महज़ संयोग नहीं, बल्कि सरकार के लिए “सहज” और “अनुकूल” न्यायिक ढांचे को बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है, जिससे असहज सवालों से बचा जा सके।

धरने पर बैठे वकीलों का कहना है कि यह लड़ाई किसी एक जज के तबादले की नहीं है, बल्कि यह पूरे न्यायिक तंत्र की आत्मा की लड़ाई है। यदि आज एक CJM को पुलिस के खिलाफ FIR का आदेश देने की कीमत चुकानी पड़ती है, तो कल कोई भी न्यायाधीश सत्ता और वर्दी के खिलाफ फैसला देने से पहले सौ बार सोचने को मजबूर होगा। यह स्थिति न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र के भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है।

वकीलों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि इस तबादले की निष्पक्ष समीक्षा नहीं हुई और अदालत के आदेश की अवहेलना करने वाले पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं की गई, तो यह आंदोलन केवल संभल तक सीमित नहीं रहेगा। यह लड़ाई अदालत के बाहर से शुरू होकर सत्ता के दरवाजों तक पहुंचेगी।

आज देश के सामने सबसे बड़ा और सबसे तीखा सवाल यही खड़ा है कि क्या इस सरकार में वास्तव में कानून सर्वोच्च है, या फिर सत्ता और वर्दी के आगे संविधान भी बौना साबित हो चुका है। संभल अब सिर्फ एक शहर नहीं रह गया है, बल्कि यह उस निर्णायक जंग का प्रतीक बन चुका है, जहां आम जनता, वकील और न्यायिक विवेक मिलकर यह तय करेंगे कि देश संविधान से चलेगा या सत्ता के इशारों पर।