स्टेडियम सूने, स्कूल बसों में भरी ‘भीड़’: क्या यही है उत्तराखंड में खेल विकास का मॉडल?

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स्टेडियम सूने, स्कूल बसों में भरी ‘भीड़’: क्या यही है उत्तराखंड में खेल विकास का मॉडल?

रुद्रपुर/उत्तराखंड।

राज्य में खेलों के विकास की तस्वीर जितनी चमकदार फाइलों और मंचों पर दिखाई देती है, ज़मीनी हकीकत उतनी ही खोखली नजर आती है। खेल आयोजनों के नाम पर स्टेडियम तो खाली पड़े रहते हैं, लेकिन स्कूलों से बच्चों को बसों में भरकर “दर्शक” जरूर बना दिया जाता है—ताकि भीड़ पूरी दिखे और तस्वीरों में आयोजन सफल लगे।

हकीकत यह है कि इन स्कूली बच्चों को न खेल की बुनियादी समझ दी जाती है, न किसी तरह का प्रशिक्षण, न ही उनके भविष्य को लेकर कोई ठोस दिशा तय की जाती है। वे खेल देखने नहीं आते, लाए जाते हैं—हाजिरी लगाने के लिए। खेल उनके लिए प्रेरणा नहीं, एक मजबूरी बनकर रह जाता है।

राज्य में खेल संस्कृति का विकास मैदानों में नहीं, दफ्तरों में हो रहा है। स्टेडियमों में सन्नाटा पसरा है, लेकिन खेल योजनाओं की फाइलें लगातार मोटी होती जा रही हैं। प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं, उद्घाटन समारोह होते हैं, मंच सजते हैं, अधिकारी भाषण देते हैं और कैमरे क्लिक होते हैं—बस दर्शक और वास्तविक खेल माहौल नदारद रहता है।

बच्चे मोबाइल में रील देखने में व्यस्त हैं और अधिकारी खाली कुर्सियों के सामने खेल संस्कृति पर लंबे-लंबे भाषण दे रहे हैं। यह विडंबना ही है कि जिस समाज में खेल देखने वाला दर्शक ही नहीं तैयार हो पा रहा, वहां से अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी निकलने की उम्मीद की जा रही है।

जिला प्रशासन और खेल आयोजन समितियों की प्रतिबद्धता कागज़ों में तो काबिले-तारीफ है। मैदान में खिलाड़ी पसीना बहाएं या न बहाएं, समिति के सदस्य पूरे उत्साह में दिखाई देते हैं। स्टेडियम खाली हों तो कोई चिंता नहीं, मंच भरा होना चाहिए। बच्चों की मौजूदगी जरूरी है—चाहे वे खेल समझें या नहीं। उद्देश्य खेल नहीं, “व्यवस्था प्रदर्शन” पूरा करना है।

खेल आयोजन अब प्रतिभा खोज का माध्यम नहीं, बल्कि एक औपचारिक सरकारी रस्म बनते जा रहे हैं। फोटो, भाषण और रिपोर्ट तैयार है—बस दर्शक और भविष्य के खिलाड़ी गायब हैं। सवाल यह नहीं है कि राज्य से पदक क्यों नहीं आ रहे, असली सवाल यह है कि क्या हम खेल देखने और समझने वाला समाज ही तैयार कर पाए हैं?

अब जिला प्रशासन और सरकार को गंभीरता से सोचना होगा कि यदि स्थानीय बच्चों को इन आयोजनों से वास्तविक लाभ नहीं मिल रहा, तो ऐसे खर्चीले कार्यक्रमों का औचित्य क्या है? खेल और प्रतिभा विकास दिखावे से नहीं, जमीनी जुड़ाव से होगा। जब तक नीतियां बच्चों के भविष्य और प्रशिक्षण पर केंद्रित नहीं होंगी, तब तक खेल आयोजन सिर्फ सरकारी औपचारिकता बनकर ही रह जाएंगे।