*“आस्था, अतिक्रमण और अंतर्विरोध: तराई की राजनीति किस मोड़ पर—2027 से पहले भाजपा की सबसे कठिन परीक्षा”*
खबर संवाद-महेंद्र पाल मौर्य मो. 8192965518
रुद्रपुर -तराई की राजनीति इन दिनों विकास और प्रशासन से अधिक प्रतीकों, बयानबाज़ी और आपसी खींचतान के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई दे रही है। रुद्रपुर से लेकर गदरपुर, किच्छा और सितारगंज तक जो घटनाक्रम सामने आ रहे हैं, वे यह संकेत दे रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी के भीतर ही संतुलन, संवाद और सामाजिक सामंजस्य की कमी उभरने लगी है, जिसका सीधा असर 2027 के विधानसभा चुनावों पर पड़ सकता है।
रुद्रपुर में विधायक शिव अरोड़ा और मेयर विकास शर्मा के बीच अलग-अलग नारियल फोड़ने से शुरू हुई प्रतिस्पर्धा अब राजनीतिक टांग खींचने से आगे बढ़कर वैचारिक और प्रतीकात्मक टकराव में बदलती दिख रही है।
विधायक द्वारा सार्वजनिक मंच से “कठ मुल्ले” जैसे शब्दों का प्रयोग और मेयर द्वारा धार्मिक स्थलों के पासद से पतीले हटाने, मजार तोड़ने और वहां डमरू-त्रिशूल चौक स्थापित करने जैसे कदमों ने शहर की राजनीति को धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर मोड़ दिया है।
इसके साथ ही अतिक्रमण हटाने के नाम पर मार्केट उजाड़कर व्यापारियों को वेंडिंग ज़ोन में शिफ्ट करने की प्रक्रिया ने उस वर्ग को नाराज़ कर दिया है, जो अब तक भाजपा का परंपरागत समर्थक माना जाता रहा है।
इन सबके बीच पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल का मुसलमानों के प्रति अपेक्षाकृत नॉर्मल और संवादात्मक रवैया एक अलग ही तुलना खड़ी करता है।
रुद्रपुर की जनता के बीच यह सवाल गहराता जा रहा है कि क्या शहर की राजनीति विकास से हटकर केवल पहचान और टकराव की राजनीति में फंसती जा रही है।
2027 के परिदृश्य को देखें तो यदि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का रुद्रपुर से चुनाव लड़ने का समीकरण बनता है, तो यह सीट प्रतिष्ठा की लड़ाई में बदल जाएगी। एक ओर मुख्यमंत्री का चेहरा और राज्य सरकार की उपलब्धियां होंगी, तो दूसरी ओर स्थानीय असंतोष, व्यापारी नाराजगी और सामाजिक तनाव। ऐसे में रुद्रपुर भाजपा के लिए जितना मजबूत किला दिखता है, उतना ही जोखिम भरा मैदान भी बन सकता है।
किच्छा विधानसभा में विधायक तिलकराज बेहड़ और पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के बीच चल रही तकरार ने पार्टी की अंदरूनी खींचतान को सार्वजनिक कर दिया है।
वहीं गदरपुर में अरविंद पांडे को भाजपा के भीतर से ही टारगेट किया जाना यह दर्शाता है कि संगठनात्मक एकता वहां भी कमजोर पड़ रही है। इन दोनों सीटों पर यदि समय रहते संतुलन नहीं साधा गया, तो विपक्ष को सीधा राजनीतिक लाभ मिल सकता है।
तराई की राजनीति में एक और अहम फैक्टर बनकर उभरी है बंगाली समाज की नाराजगी। प्रहलाद पलसिया में बंगाली परिवारों के उजाड़े जाने का मुद्दा, मुन्ना सिंह चौहान की बयानबाज़ी, और उसी क्षेत्र में मत्स्य विभाग का प्रोजेक्ट लगाकर संदेश देने की कोशिश—ये सभी घटनाएं यह बताती हैं कि भाजपा एक तरफ विकास का नैरेटिव गढ़ना चाहती है, लेकिन दूसरी तरफ सामुदायिक असंतोष को पूरी तरह साध नहीं पा रही। बंगाली समाज, जो तराई की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है, यदि असंतुष्ट रहता है तो इसका असर केवल स्थानीय नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्रीय समीकरण पर पड़ेगा।
सितारगंज में विधायक और कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुणा की कार्यशैली को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। प्रशासनिक सख्ती और योजनाओं की घोषणा के बावजूद ज़मीनी स्तर पर संवाद की कमी यदि बनी रहती है, तो तराई में भाजपा की पकड़ धीरे-धीरे ढीली पड़ सकती है।

कुल मिलाकर, रुद्रपुर, किच्छा और गदरपुर—तीनों विधानसभा क्षेत्रों में जो हालात बन रहे हैं, वे यह साफ संकेत दे रहे हैं कि भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपने ही भीतर के अंतर्विरोध, सामाजिक संतुलन और स्थानीय नाराजगी हैं। यदि आने वाले समय में पार्टी ने बयानबाज़ी की राजनीति से हटकर संवाद, विकास और समावेशी दृष्टिकोण नहीं अपनाया, तो 2027 में तराई की राजनीति वह रूप ले सकती है, जिसकी कल्पना शायद आज भाजपा नेतृत्व भी नहीं कर रहा है।
