*कुमाऊनी भाषा सम्मेलन में जगी भाषा को बचाने की अपील*
रुद्रपुर – कुमाऊनी भाषा की घट रही लोकप्रियता को लेकर कुमाऊं भर के बुद्धजीवियों ने अपनी कुमाऊनी भाषा और बोली को बचाने के लिए कुमाऊनी भाषा सम्मेलन का आयोजन रुद्रपुर में किया। सम्मेलन का आगाज पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व सांसद व पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने किया।
सम्मेलन में बहादुर सिंह बिष्ट, पूर्व निदेशक उच्च शिक्षा, कस्तूबानंद चंदोला, अध्यक्ष लखनऊ, डा अजंता बिष्ट, प्रधानाचार्य डाइट रुद्रपुर, आनंद सिंह धामी, पैरामाउंट एकेडमी, किशन सिंह मलडा बागेश्वर, डा के सी चंदोला, धीरेश कुमार जोशी ब्रिगेडियर, भरत लाल शाह शैल सांस्कृतिक समिति, जनार्दन चिलकोटी, डॉ बी एस बिष्ट संयोजक, डा ललित मोहन उप्रेती सह संयोजक, योगेंद्र दत्त बिष्ट, प्रकाश चंद्र पांडे, हयात सिंह रावत, संरक्षक अल्मोड़ा, बीना तिवारी हल्द्वानी, दयाल चंद्र पांडे क्रिएटिव उत्तराखंड, हेम पंत क्रिएटिव उत्तराखंड, दिवाकर पांडे शैल सांस्कृतिक समिति, पटवाल, योगेश वर्मा सांसद प्रतिनिधि, गिरीशचंद्र जोशी गाजियाबाद, प्रकाश पांडे, चारु तिवारी दिल्ली, मनोज चंदोला दिल्ली, मोहन चंद्र पंत हल्द्वानी, लेखक मीरा जोशी, दामोदर जोशी दीपा कांडपाल, हेमा हर्बोला हल्द्वानी, दिनेश पंत, अतुल जोशी, योगेश, महेंद्र ठाकुराली, डा बी एस कालाकोटी पर्यावरण संरक्षण, प्रभास उप्रेती लेखक हल्द्वानी सहित 200 से अधिक लेखक, साहित्यकार, संस्कृति कर्मी, रंगकर्मी, प्रबुद्ध नागरिक समलित थे।
वक्ताओं ने कुमाऊं और तराई का इतिहास बताते हुए कहा कि रुद्रपुर को चंद राजा रूद्र चंद्र द्वारा बसाया गया था और इसी प्रकार बाजपुर को राजा बाज बहादुर चंद और काशीपुर मे चंद राजा राजाओं ने राज किया था तथा किला भी बनाया।
सम्मेलन में ब्रिगेडियर धीरज कुमार जोशी की पुस्तक कथंजलि, प्रकाश चंद्र तिवारी की पुस्तक, कविता की कहानी, एडवोकेट ललित मोहन सिंह जीना, भारतीय वायु सेना दुद बोलिक कर्ज, मोहन चंद्र पंत की पुस्तक, कुमाऊनी लोक कथाएं आदि किताबों का विमोचन किया गया।
प्रथम सत्र की अध्यक्षता के सी चंदोला सदस्य उत्तराखंड भाषा संस्थान द्वारा की गई और मुख्य अतिथि भगत सिंह कोश्यारी पूर्व मुख्य मंत्री उत्तराखंड और पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी थे।
सम्मेलन के संरक्षक हयात सिंह रावत द्वारा सम्मेलन की रूप रेखा और उद्देश्यों के बारे में बताया कि 16 वर्षों से लगातार सम्मेलन और जागरूकता कार्यक्रम चलाया जा रहा है ताकि इस भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जा सके, इसके लिए जरूरी सभी विद्याओं में कार्य किया जा रहा है बोलने और समझने वालों की संख्या भी पर्याप्त है, राजनीतिक इच्छा शक्ति हो तो यह कार्य आसानी से हो सकता है।
कश्मीर में जब भाषाओं को इस अनुसूची में सम्मिलित किया गया है कश्मीरी और डोगरी। उत्तराखंड की कुमाऊनी और गढ़वाली को भी इस अनुसूची में शामिल किया जा सकता है। देश में 20 से अधिक भाषाएं इस अनुसूची में शामिल हैं और उन प्रदेश वासियों को ऊर्जा प्रदान कर रही हैं।
