

आकाओं की नजरों में ‘हिंदुत्व की राजनीति’ चमकाने की कोशिश या रुद्रपुर में नफरत की जमीन तैयार? ‘गोल टोपी-मुल्ला, कठमुल्ला ’ जैसे शब्दों से आहत उलेमा-इमाम और मुस्लिम समाज , ईदगाह में नमाज़ की मांग के बीच विधायक शिव अरोरा और मेयर विकास शर्मा के बयानों पर उठे गंभीर सवाल।

=समाचार इंडिया 1 ब्यूरो ) रुद्रपुर – उत्तराखंड के औद्योगिक शहर रुद्रपुर की राजनीति इन दिनों एक बार फिर तीखी बयानबाज़ी और सांप्रदायिक शब्दावली को लेकर चर्चा के केंद्र में आ गई है। शहर के जनप्रतिनिधियों के कुछ सार्वजनिक मंचों से दिए गए बयानों को लेकर सामाजिक और राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। खास तौर पर शिव अरोरा और विकास शर्मा के हालिया भाषणों में इस्तेमाल हुई भाषा को लेकर सवाल उठने लगे हैं और कई सामाजिक संगठनों ने इसे शहर के सामाजिक ताने-बाने के लिए चिंताजनक बताया है।
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि कुछ मंचों से “गोल टोपी”, “मुल्ला” और “कठमुल्ला” जैसे शब्दों का प्रयोग लगातार किया जा रहा है।
आलोचकों का कहना है कि ऐसी शब्दावली सीधे तौर पर एक समुदाय की धार्मिक पहचान को निशाना बनाती है, जिससे समाज में अनावश्यक तनाव पैदा हो सकता है। कई लोगों का मानना है कि राजनीतिक मंचों से इस तरह की भाषा का इस्तेमाल रुद्रपुर जैसे बहु-सांस्कृतिक शहर की पहचान के विपरीत है, जहां वर्षों से अलग-अलग समुदायों के लोग आपसी भाईचारे के साथ रहते आए हैं।
इसी बीच शहर में ईदगाह में नमाज़ पढ़ने की व्यवस्था और उससे जुड़ी मांगों को लेकर भी माहौल चर्चा में है। स्थानीय मुस्लिम समाज और मस्जिदों से जुड़े उलेमा तथा इमामों का कहना है कि धार्मिक स्थलों और धार्मिक आस्थाओं को लेकर संवेदनशीलता बनाए रखना जरूरी है। उनका कहना है कि एक तरफ समुदाय अपने धार्मिक अधिकारों और ईदगाह में नमाज़ पढ़ने की व्यवस्था को लेकर प्रशासन से मांग कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक मंचों से ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाना उनकी भावनाओं को आहत करता है।
मस्जिदों से जुड़े कई इमामों और उलेमा ने यह भी कहा है कि जब धार्मिक पहचान को लेकर तंज भरे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है तो इससे समाज में दूरी बढ़ने का खतरा पैदा होता है। उनका मानना है कि जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी केवल राजनीतिक बयान देना नहीं बल्कि समाज के सभी वर्गों के बीच विश्वास और सम्मान बनाए रखना भी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इन बयानों को केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित करके नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे व्यापक राजनीतिक रणनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि हिंदुत्व की छवि को अधिक मुखर रूप से पेश करने और शीर्ष नेतृत्व की नजरों में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए इस तरह के तीखे बयान दिए जा रहे हैं। वहीं विरोधी दलों और आलोचकों का आरोप है कि गरीब और भावनात्मक मुद्दों से प्रभावित वोटरों के बीच धार्मिक ध्रुवीकरण पैदा कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश भी हो सकती है।
राज्य स्तर की राजनीति में भी समय-समय पर धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े बयान सामने आते रहे हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी कई मौकों पर राज्य की सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं को मजबूत करने की बात कहते रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि यह सांस्कृतिक गौरव का विषय है, जबकि आलोचक यह भी कहते हैं कि राजनीतिक नेतृत्व को भाषा और संदेश दोनों में संतुलन बनाए रखना चाहिए ताकि समाज में किसी तरह की गलतफहमी या तनाव पैदा न हो।
राष्ट्रीय राजनीति में भी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का मुद्दा कई बार प्रमुखता से सामने आता रहा है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी अपने कई भाषणों में सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और राष्ट्रवाद से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं। समर्थक इसे देश की सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखते हैं, जबकि आलोचक इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण के रूप में भी व्याख्यायित करते हैं। इसी पृष्ठभूमि में रुद्रपुर की स्थानीय राजनीति में हो रही बयानबाज़ी को भी कई लोग उसी बड़े राजनीतिक विमर्श की एक कड़ी के रूप में देख रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच शहर के जिम्मेदार नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने अपील की है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और वैचारिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन सार्वजनिक मंचों से इस्तेमाल होने वाली भाषा ऐसी होनी चाहिए जो समाज को जोड़ने का काम करे। उनका कहना है कि जनता ने अपने प्रतिनिधियों को शहर के विकास, रोजगार, आधारभूत सुविधाओं और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करने के लिए चुना है, न कि समाज को बांटने वाली बयानबाज़ी के लिए।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या रुद्रपुर की राजनीति आने वाले समय में विकास और जनसमस्याओं पर केंद्रित होगी या फिर बयानबाज़ी और धार्मिक पहचान से जुड़े विवाद ही राजनीतिक विमर्श का मुख्य केंद्र बने रहेंगे। फिलहाल इतना जरूर है कि इन बयानों और ईदगाह में नमाज़ को लेकर उठ रही मांगों ने शहर की सियासत में नई बहस को जन्म दे दिया है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं और तेज हो सकती हैं।
