तराई की राजनीति का महाभारत: ठुकराल, बेहड़, शिव अरोड़ा, विकास शर्मा और अन्य नेताओं की जंग में क्या पीछे छूट गया रुद्रपुर का विकास?

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तराई की राजनीति का महाभारत: ठुकराल, बेहड़, शिव अरोड़ा, विकास शर्मा और अन्य नेताओं की जंग में क्या पीछे छूट गया रुद्रपुर का विकास?


रुद्रपुर। उत्तराखंड के राजनीतिक मानचित्र पर ऊधम सिंह नगर और विशेष रूप से रुद्रपुर विधानसभा हमेशा से राजनीतिक संघर्ष, वैचारिक टकराव और प्रभावशाली व्यक्तित्वों की प्रतिस्पर्धा का केंद्र रही है। औद्योगिक राजधानी कहलाने वाले इस क्षेत्र ने विकास की अनेक संभावनाएं देखीं, लेकिन इसके साथ-साथ ऐसी राजनीतिक लड़ाइयां भी देखीं जिनकी गूंज विधानसभा से लेकर दिल्ली और देहरादून तक सुनाई देती रही।

रुद्रपुर की राजनीति का उल्लेख राजकुमार ठुकराल के बिना अधूरा माना जाता है। छात्र राजनीति और हिंदुत्व की पृष्ठभूमि से उभरे ठुकराल ने खुद को एक आक्रामक जननेता के रूप में स्थापित किया। उनके समर्थक उन्हें संघर्षशील और जनता के बीच रहने वाला नेता बताते हैं, जबकि विरोधी उनके राजनीतिक तौर-तरीकों पर सवाल उठाते रहे हैं। भाजपा से उनका लंबा संबंध रहा, लेकिन समय के साथ संगठनात्मक मतभेद बढ़े, टिकट कटा, निर्दलीय चुनाव लड़े और बाद में कांग्रेस का दामन थाम लिया। यह सफर केवल एक नेता का नहीं बल्कि उत्तराखंड की बदलती राजनीतिक संस्कृति का भी प्रतीक माना जाता है।

यदि तराई की राजनीति के दूसरे बड़े चेहरे की बात की जाए तो तिलक राज बेहड़ का नाम प्रमुखता से सामने आता है। कांग्रेस की राजनीति में दशकों तक प्रभाव रखने वाले बेहड़ ने संगठन और प्रशासनिक अनुभव के बल पर अपनी पहचान बनाई। मंत्री पद से लेकर क्षेत्रीय राजनीति तक उनका प्रभाव लंबे समय तक कायम रहा। समर्थक उन्हें अनुभवी और विकासवादी नेता बताते हैं, जबकि विरोधियों का आरोप रहा कि लंबे राजनीतिक कार्यकाल के बावजूद क्षेत्र की कई मूलभूत समस्याएं जस की तस बनी रहीं। इसके बावजूद तराई की राजनीति में उनकी पकड़ और नेटवर्क आज भी चर्चा का विषय है।

वर्तमान दौर में रुद्रपुर विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर रहे शिव अरोड़ा अपेक्षाकृत नए लेकिन तेजी से उभरे राजनीतिक चेहरों में गिने जाते हैं। व्यापारी वर्ग से राजनीति में आए शिव अरोड़ा ने भाजपा संगठन के माध्यम से अपनी पहचान बनाई और विधानसभा तक पहुंचे। समर्थक उनके कार्यकाल को विकास परियोजनाओं और संगठनात्मक समन्वय से जोड़ते हैं, जबकि विपक्षी दल बेरोजगारी, ट्रैफिक, जलभराव और शहरी अव्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर उन पर सवाल उठाते हैं।

रुद्रपुर नगर निगम की राजनीति में विकास शर्मा का नाम भी पिछले कुछ वर्षों में तेजी से उभरा है। महापौर के रूप में उनका कार्यकाल नगर निगम की व्यवस्थाओं, सफाई, सड़क, प्रकाश व्यवस्था और शहरी विकास योजनाओं के संदर्भ में लगातार चर्चा में रहा। समर्थक उन्हें जमीन से जुड़ा जनप्रतिनिधि बताते हैं, जबकि आलोचक नगर निगम क्षेत्र की अनेक समस्याओं के समाधान की गति को लेकर प्रश्न उठाते हैं।

महिला नेतृत्व की बात करें तो मीना शर्मा भी लंबे समय से स्थानीय राजनीति का सक्रिय चेहरा रही हैं। सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों के माध्यम से उन्होंने अपनी पहचान बनाई। विभिन्न चुनावों और जनसंपर्क अभियानों में उनकी भूमिका ने उन्हें स्थानीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया। हालांकि अन्य नेताओं की तरह उन्हें भी समय-समय पर राजनीतिक आलोचनाओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

रुद्रपुर और तराई क्षेत्र की राजनीति में सुभाष चतुर्वेदी का नाम भी लगातार सक्रिय रहा है। संगठनात्मक राजनीति, सामाजिक कार्यक्रमों और विभिन्न जनसरोकारों के मुद्दों पर उनकी उपस्थिति बनी रही। स्थानीय राजनीतिक समीकरणों में उनका प्रभाव कई बार चुनावी रणनीतियों को प्रभावित करता दिखाई दिया है।

तराई की राजनीति को समझने के लिए केवल नेताओं को देखना पर्याप्त नहीं है। इस क्षेत्र ने आतंकवाद का दौर भी देखा है। 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में उग्रवाद के प्रभाव के दौरान तराई क्षेत्र सुरक्षा एजेंसियों की नजर में रहा। कई घटनाओं, विस्फोटों और सुरक्षा अभियानों ने पूरे क्षेत्र को प्रभावित किया। इसके बाद अक्टूबर 1991 के सांप्रदायिक तनाव ने सामाजिक ताने-बाने पर गहरा प्रभाव डाला। इन घटनाओं ने राजनीति को भी प्रभावित किया और आने वाले वर्षों में चुनावी विमर्श का हिस्सा बनी रहीं।

समय के साथ राजनीतिक दल बदलते रहे, चेहरे बदलते रहे, गठबंधन बदलते रहे, लेकिन जनता के सामने मौजूद कई समस्याएं स्थायी रूप से समाधान की प्रतीक्षा करती रहीं। रुद्रपुर आज भी ट्रैफिक जाम, जलभराव, अवैध कॉलोनियों, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, युवाओं के रोजगार, किसानों की समस्याओं और तेजी से बढ़ते शहरी दबाव जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पिछले तीन दशकों में तराई की राजनीति का बड़ा हिस्सा व्यक्तित्व आधारित राजनीति के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। कभी ठुकराल बनाम बेहड़, कभी भाजपा बनाम कांग्रेस, कभी संगठन बनाम व्यक्ति और कभी स्थानीय बनाम बाहरी नेतृत्व की बहसें चुनावी मुद्दों पर भारी पड़ती रही हैं।

आज जब अगली चुनावी तैयारियां शुरू हो रही हैं तो जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजनीति फिर से व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमेगी या फिर विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दे केंद्र में आएंगे। राजकुमार ठुकराल, तिलक राज बेहड़, शिव अरोड़ा, विकास शर्मा, मीना शर्मा, सुभाष चतुर्वेदी और अन्य नेताओं का राजनीतिक मूल्यांकन अंततः जनता ही करेगी, लेकिन इतना तय है कि तराई का भविष्य केवल राजनीतिक संघर्षों से नहीं बल्कि ठोस विकास और जवाबदेह नेतृत्व से तय होगा।

रुद्रपुर की जनता अब केवल राजनीतिक नारों और शक्ति प्रदर्शन से आगे बढ़कर परिणाम चाहती है। आने वाला समय तय करेगा कि तराई की राजनीति पुराने संघर्षों की राह पर चलती है या विकास की नई दिशा तलाशती है