“खेत बचाओ या प्रचार बढ़ाओ? रुद्रपुर में केंद्रीय मंत्री के कार्यक्रम से पहले किसानों के ज्वलंत सवाल”

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“खेत बचाओ या प्रचार बढ़ाओ? रुद्रपुर में केंद्रीय मंत्री के कार्यक्रम से पहले किसानों के ज्वलंत सवाल”
रुद्रपुर। 26 जून को केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री Shivraj Singh Chouhan का रुद्रपुर आगमन प्रस्तावित है। बताया जा रहा है कि वे कृषि एवं किसानों से जुड़े एक विशेष कार्यक्रम में भाग लेंगे और खेती-किसानी को मजबूत बनाने के लिए केंद्र सरकार की योजनाओं का संदेश देंगे। लेकिन मंत्री के दौरे से पहले ही किसानों के बीच एक बड़ा सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है—क्या केवल “खेत बचाओ” के नारे से खेती बच जाएगी, या किसानों की वास्तविक समस्याओं का समाधान भी होगा?
क्षेत्र के किसानों का कहना है कि आज खेती कई मोर्चों पर संकट से घिरी हुई है। एक ओर सरकार खेती को लाभकारी बनाने के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर किसान बढ़ती लागत, आवारा पशुओं और सिंचाई के बढ़ते खर्च से परेशान हैं।
आवारा पशु बने किसानों की सबसे बड़ी परेशानी
ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा पशुओं का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। किसानों का आरोप है कि दिनभर खेतों में मेहनत करने के बाद रात में फसलों की रखवाली करनी पड़ती है। गेहूं, धान, मक्का, गन्ना और सब्जियों की फसलें आवारा पशुओं द्वारा नष्ट कर दी जाती हैं।
कई किसानों ने अपनी फसलों की सुरक्षा के लिए कांटेदार तार, जाली और बाड़ लगाने पर हजारों रुपये खर्च किए हैं। लेकिन छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह खर्च उठाना आसान नहीं है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब खेतों को सबसे बड़ा खतरा आवारा पशुओं से है, तो इस समस्या के स्थायी समाधान पर सरकार की क्या योजना है?
खाद, बीज और दवाइयों की बढ़ती कीमतों ने बढ़ाया बोझ
किसानों का कहना है कि खेती में उपयोग होने वाली खाद, बीज, कीटनाशक और कृषि उपकरणों की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है। उत्पादन लागत बढ़ने के बावजूद फसलों का लाभकारी मूल्य नहीं मिल पा रहा है।
खेती से होने वाली आमदनी और लागत के बीच बढ़ती खाई ने किसानों की आर्थिक स्थिति को कमजोर किया है। किसानों का आरोप है कि सरकारी मंचों पर योजनाओं की चर्चा तो होती है, लेकिन जमीन पर लागत कम करने के ठोस उपाय दिखाई नहीं देते।
सिंचाई पर बढ़ता खर्च, डीजल-पेट्रोल ने बढ़ाई चिंता
कई क्षेत्रों में किसान आज भी ट्यूबवेल और डीजल पंपों के सहारे सिंचाई करते हैं। डीजल और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने सिंचाई का खर्च काफी बढ़ा दिया है। जिन किसानों के पास बिजली आधारित सिंचाई की सुविधा नहीं है, उनके लिए खेती करना और अधिक महंगा हो गया है।
किसानों का कहना है कि यदि सिंचाई ही महंगी होती जाएगी तो खेती लाभ का नहीं, बल्कि घाटे का सौदा बन जाएगी।
छोटे किसानों की हालत सबसे ज्यादा खराब
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सीमांत और छोटे किसान सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। बड़े किसान किसी तरह अतिरिक्त खर्च वहन कर लेते हैं, लेकिन दो से पांच एकड़ तक की जोत वाले किसानों के लिए आवारा पशुओं से सुरक्षा, सिंचाई और कृषि निवेश का खर्च लगातार चुनौती बनता जा रहा है।
किसानों के सवालों के बीच मंत्री का दौरा
केंद्रीय कृषि मंत्री के रुद्रपुर दौरे को लेकर प्रशासन और कृषि विभाग तैयारियों में जुटा है। सरकारी स्तर पर इसे किसानों के हित में महत्वपूर्ण कार्यक्रम बताया जा रहा है। लेकिन किसानों और किसान संगठनों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में “खेत बचाओ” अभियान को सफल बनाना चाहती है तो उसे मंचीय भाषणों से आगे बढ़कर किसानों की मूल समस्याओं पर ठोस निर्णय लेने होंगे।
किसानों की प्रमुख मांगें
आवारा पशुओं की समस्या का स्थायी समाधान।
खाद, बीज और कृषि दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण।
सिंचाई के लिए डीजल और बिजली पर विशेष राहत।
फसलों का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना।
छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष सुरक्षा योजना।
बड़ा सवाल
26 जून को रुद्रपुर में होने वाले कार्यक्रम के बीच किसानों के मन में एक ही प्रश्न गूंज रहा है—क्या “खेत बचाओ अभियान” वास्तव में खेतों और किसानों को बचाने का अभियान बनेगा, या फिर यह केवल सरकारी उपलब्धियों का एक और मंच साबित होगा?
किसानों को अब नारों से ज्यादा उम्मीद उन फैसलों की है जो उनकी फसलों, उनकी आय और उनके भविष्य को सुरक्षित कर सकें। यही वजह है कि मंत्री के दौरे से पहले क्षेत्र में खेती और किसानों की वास्तविक समस्याएं चर्चा के केंद्र में हैं।