

क्या खिसक रही है भाजपा की जमीन? ‘खेत बचाओ’ कार्यक्रम या अव्यवस्थाओं का मंच—भीषण गर्मी, बंद गेट, खाली कुर्सियों के बीच शुरू हुआ केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का भाषण, मीडिया कवरेज पर रोक के आरोपों ने भी खड़े किए बड़े सवाल
रुद्रपुर। शुक्रवार को रुद्रपुर के गांधी पार्क में आयोजित केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान के “खेत बचाओ” कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों के हितों और खेती बचाने का संदेश देना था, लेकिन कार्यक्रम के दौरान सामने आए घटनाक्रम ने आयोजन की व्यवस्थाओं और जनभागीदारी को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए। भीषण गर्मी, उमस, पंडाल में खाली पड़ी कुर्सियां, लोगों की बेचैनी और मीडिया कवरेज को लेकर लगे आरोपों ने पूरे कार्यक्रम को चर्चा के केंद्र में ला दिया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कार्यक्रम के दौरान तेज गर्मी के कारण बड़ी संख्या में लोग परेशान नजर आए। कई लोग पंडाल से बाहर निकलना चाहते थे, जबकि मौके पर मौजूद प्रशासनिक अधिकारी उन्हें कार्यक्रम स्थल पर बनाए रखने का प्रयास करते रहे। चर्चा यह भी रही कि लोगों के बाहर निकलने को नियंत्रित करने के लिए कुछ समय के लिए गेट बंद किए गए, जिसके चलते कुछ लोग दीवार फांदकर बाहर निकलते दिखाई दिए। इन दावों पर प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
जब केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का संबोधन शुरू हुआ तो पंडाल में कई स्थानों पर खाली कुर्सियां दिखाई दीं। इस दृश्य ने राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि क्या कार्यक्रम अपेक्षित जनसमर्थन जुटाने में सफल रहा या भीषण गर्मी और व्यवस्थाओं की कमी का असर उपस्थिति पर पड़ा। इन दृश्यों को लेकर विभिन्न तरह की राजनीतिक चर्चाएं भी शुरू हो गईं।
कार्यक्रम की कवरेज के लिए पहुंचे कुछ पत्रकारों और मीडिया प्रतिनिधियों ने भी आरोप लगाया कि उन्हें स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग करने में बाधाओं का सामना करना पड़ा। यदि ऐसा हुआ है, तो यह सार्वजनिक कार्यक्रमों में मीडिया की स्वतंत्र भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े करता है। हालांकि, इस संबंध में भी प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
लेकिन इन तमाम घटनाओं से कहीं बड़ा सवाल उस किसान का है, जिसके नाम पर यह कार्यक्रम आयोजित किया गया। मंच से “खेत बचाओ” का संदेश जरूर दिया गया, लेकिन किसान आज भी उन समस्याओं से जूझ रहा है जिनका समाधान उसे वर्षों से नहीं मिल पाया है। देश के अनेक हिस्सों में कृषि योग्य भूमि पर तेजी से आवासीय कॉलोनियां और व्यावसायिक निर्माण हो रहे हैं। उपजाऊ खेत धीरे-धीरे कंक्रीट में बदल रहे हैं। यदि यही स्थिति जारी रही तो भविष्य में खेती योग्य भूमि का संरक्षण बड़ी चुनौती बन सकता है।
किसानों की लागत लगातार बढ़ रही है। खाद, बीज, कीटनाशक और डीजल के बढ़ते दामों ने खेती को महंगा बना दिया है। सिंचाई का खर्च बढ़ा है, कई क्षेत्रों में नहरों और सिंचाई परियोजनाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं है। आवारा पशु और जंगली जानवर तैयार फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। बाढ़, सूखा, ओलावृष्टि और असमय बारिश जैसी प्राकृतिक आपदाएं अलग से किसानों की मुश्किलें बढ़ा रही हैं। किसान संगठन लंबे समय से लाभकारी मूल्य, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की प्रभावी व्यवस्था, कृषि लागत कम करने और खेती की सुरक्षा जैसे मुद्दे उठाते रहे हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि खेती से जुड़े लोगों की आत्महत्याएं आज भी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई हैं। यह स्थिति बताती है कि खेती का संकट केवल उत्पादन का नहीं, बल्कि आजीविका और सामाजिक सुरक्षा का भी प्रश्न है।
ऐसे में रुद्रपुर का यह कार्यक्रम केवल एक सरकारी आयोजन भर नहीं रहा, बल्कि कई अहम सवाल छोड़ गया। यदि वास्तव में “खेत बचाओ” अभियान को सार्थक बनाना है तो केवल मंच से दिए गए भाषण पर्याप्त नहीं होंगे। खेती योग्य भूमि का संरक्षण, किसानों की आय बढ़ाने के ठोस उपाय, सिंचाई व्यवस्था में सुधार, लागत कम करने की नीति, आवारा पशुओं की समस्या का समाधान और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावी राहत जैसी योजनाओं का धरातल पर प्रभावी क्रियान्वयन ही इस अभियान की वास्तविक सफलता तय करेगा। अन्यथा खाली कुर्सियां, अव्यवस्थाएं और किसानों के अनुत्तरित सवाल ऐसे आयोजनों के उद्देश्य पर बहस को और तेज करते रहेंगे।




