**जंतर-मंतर में छात्रों के समर्थन में पहुंचे असिस्टेंट प्रोफेसर को नौकरी से निकाला! बरेली के डॉ. मोहित भारद्वाज ने लगाया उत्पीड़न का आरोप, डीएम से लगाई न्याय की गुहार

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**जंतर-मंतर में छात्रों के समर्थन में पहुंचे असिस्टेंट प्रोफेसर को नौकरी से निकाला! बरेली के डॉ. मोहित भारद्वाज ने लगाया उत्पीड़न का आरोप, डीएम से लगाई न्याय की गुहार
उत्तर प्रदेश के बरेली जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने शिक्षा जगत और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। बहेड़ी स्थित गन्ना उत्पादक (स्नातकोत्तर) महाविद्यालय में कॉमर्स विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मोहित भारद्वाज ने आरोप लगाया है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के समर्थन में आयोजित आंदोलन में शामिल होने की वजह से उन्हें कॉलेज प्रबंधन ने नौकरी से हटा दिया। उनका कहना है कि आंदोलन से लौटने के अगले ही दिन जब वह नियमित रूप से अपनी ड्यूटी पर कॉलेज पहुंचे तो उन्हें सेवा समाप्ति का पत्र थमा दिया गया।
डॉ. मोहित भारद्वाज के अनुसार उनकी नियुक्ति वर्ष 2024 में महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय की स्वीकृति के बाद हुई थी और वह लगातार अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे थे। उनका दावा है कि उनके कार्यकाल के दौरान कभी भी उनके खिलाफ कोई शिकायत या अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हुई। इतना ही नहीं, हाल ही में कॉलेज प्रशासन की ओर से उन्हें उनके उत्कृष्ट कार्य, अनुशासन और संतोषजनक सेवाओं के लिए प्रशंसा पत्र भी दिया गया था। ऐसे में अचानक बिना किसी पूर्व सूचना, कारण बताओ नोटिस या विभागीय जांच के सेवा समाप्त कर देना पूरी तरह से नियमों के विपरीत है।
उन्होंने आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर आयोजित छात्र आंदोलन में वह एक जागरूक नागरिक और शिक्षक के रूप में शामिल हुए थे। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण तरीके से किसी आंदोलन में भाग लेना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसी कारण उन्हें निशाना बनाया गया और कॉलेज प्रबंधन ने प्रताड़ित करते हुए उनकी नौकरी समाप्त कर दी।
इस कार्रवाई के बाद डॉ. मोहित भारद्वाज ने बरेली के जिलाधिकारी को प्रार्थना-पत्र सौंपकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उन्होंने अपनी सेवा बहाल किए जाने, बकाया वेतन का भुगतान कराने और बिना नियमानुसार कार्रवाई किए सेवा समाप्त करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की भी मांग की है। साथ ही उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से भी हस्तक्षेप कर न्याय दिलाने की अपील की है।
यह मामला सामने आने के बाद शिक्षा जगत और सामाजिक संगठनों में भी चर्चा तेज हो गई है। कई लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कर्मचारियों के अधिकारों से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि कॉलेज प्रबंधन की ओर से इस पूरे विवाद पर अभी तक कोई विस्तृत सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया गया है। अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन की जांच और आगे होने वाली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।