32 साल बाद रामपुर तिराहा गोलीकांड मामले में बड़ा फैसला, फर्जी हथियार बरामदगी का सच आया सामने; आंदोलनकारियों की बड़ी जीत

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32 साल बाद रामपुर तिराहा गोलीकांड मामले में बड़ा फैसला, फर्जी हथियार बरामदगी का सच आया सामने; आंदोलनकारियों की बड़ी जीत
मुजफ्फरनगर/उत्तराखंड। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के सबसे दर्दनाक अध्यायों में शामिल रामपुर तिराहा गोलीकांड से जुड़े फर्जी हथियार बरामदगी मामले में करीब 32 वर्षों बाद अदालत का ऐतिहासिक फैसला आया है। अदालत ने माना कि पुलिस ने निर्दोष राज्य आंदोलनकारियों को अपराधी साबित करने के लिए झूठे साक्ष्य गढ़े और फर्जी दस्तावेज तैयार किए। इस फैसले को उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में न्याय की बड़ी जीत माना जा रहा है।
रामपुर तिराहा गोलीकांड में पुलिस फायरिंग में कई राज्य आंदोलनकारियों की जान गई थी। घटना के बाद पुलिस ने अपनी कार्रवाई को सही ठहराने के लिए दावा किया कि आंदोलनकारी अवैध तमंचे, कारतूस और धारदार हथियार लेकर आए थे तथा उन्होंने पुलिस पर फायरिंग की, जिसके जवाब में पुलिस को गोली चलानी पड़ी।
हालांकि मामले की जांच जब सीबीआई को सौंपी गई तो पुलिस के इन दावों की परतें खुल गईं। जांच में सामने आया कि हथियारों की बरामदगी पूरी तरह फर्जी थी। सीबीआई ने पाया कि जब्ती मेमो बाद में तैयार किए गए और कई गवाहों से खाली कागजों पर हस्ताक्षर कराकर उन्हें साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की गई।
जांच के आधार पर सीबीआई ने तत्कालीन एसएचओ बृजकिशोर, कांस्टेबल उमेश चंद और अनिल कुमार के खिलाफ फर्जी दस्तावेज तैयार करने, धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसी धाराओं में चार्जशीट दाखिल की थी।
लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने माना कि पुलिस ने झूठे साक्ष्य गढ़कर न्याय व्यवस्था को गुमराह करने और निर्दोष राज्य आंदोलनकारियों को बदनाम करने की साजिश रची। अदालत का यह फैसला उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।
फैसले के बाद आंदोलनकारियों के परिजनों और उत्तराखंड समर्थकों में खुशी का माहौल है। उनका कहना है कि यह केवल एक मुकदमे का फैसला नहीं, बल्कि उन सभी आंदोलनकारियों के सम्मान की बहाली है, जिन पर वर्षों तक झूठे आरोप लगाए गए। इस निर्णय ने यह भी स्पष्ट संदेश दिया है कि कानून के सामने कोई भी व्यक्ति, चाहे वह वर्दी में ही क्यों न हो, जवाबदेही से ऊपर नहीं है।
रामपुर तिराहा गोलीकांड के चश्मदीद और सीबीआई के गवाह रहे महावीर शर्मा के पुत्र पप्पू शर्मा ने अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि “यह निर्णय उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों की बड़ी जीत है। भले ही न्याय मिलने में 32 वर्ष लग गए, लेकिन आखिरकार सच की जीत हुई और आंदोलनकारियों पर लगाए गए झूठे आरोप बेनकाब हो गए।”