

मुफ्ती को बचाने की ‘पहुंच’ पड़ी भारी, चौकी से सीधे सलाखों तक पहुंचे! एक पार्षद व कांग्रेसी नेता/पार्षद प्रतिनिधि की भूमिका पर सवाल, अपने ही समाज में घिरे


रुद्रपुर। बारावफात जुलूस के दौरान त्रिशूल चौक पर कथित भड़काऊ भाषण के मामले में मुफ्ती मुजीब अहमद की गिरफ्तारी के बाद अब सियासी हलकों में पुलिस कार्रवाई के साथ-साथ एक पार्षद व कांग्रेसी नेता/पार्षद प्रतिनिधि की कथित भूमिका भी चर्चा का विषय बन गई है। समाज के कुछ लोगों का आरोप है कि मुकदमा दर्ज होने के बाद मुफ्ती को कानूनी विशेषज्ञ से सलाह लेकर अदालत की शरण लेने के बजाय राजनीतिक पहुंच और पुलिस-प्रशासन में कथित प्रभाव का भरोसा दिलाया गया।
बताया जा रहा है कि मुफ्ती मुजीब को यह विश्वास दिलाया गया कि मामला बातचीत से सुलझ जाएगा और गिरफ्तारी की नौबत नहीं आएगी। आरोप है कि इसी भरोसे के बीच उन्हें रामपुरा चौकी तक ले जाया गया, जहां पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। इसके बाद पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया पूरी की और न्यायालय में पेश किए जाने के बाद मुफ्ती को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
गिरफ्तारी के बाद अब समाज में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जिस राजनीतिक ‘पहुंच’ के भरोसे गिरफ्तारी नहीं होने की बात कही जा रही थी, वही पहुंच चौकी पर पहुंचते ही बेअसर कैसे हो गई? समाज के कुछ लोगों का कहना है कि यदि मामला गंभीर था तो पहले ही कानूनी रास्ता अपनाया जाना चाहिए था और यदि गिरफ्तारी की कोई आशंका नहीं थी तो फिर मुफ्ती सीधे न्यायिक हिरासत तक कैसे पहुंच गए।
इस घटनाक्रम ने संबंधित नेताओं की कथित राजनीतिक समझ और प्रभाव को लेकर भी बहस छेड़ दी है। कुछ लोगों का आरोप है कि संकट की घड़ी में समाज को भरोसा दिलाने के बजाय ऐसी रणनीति अपनाई गई जिसका परिणाम मुफ्ती की गिरफ्तारी के रूप में सामने आया। अब यही लोग संबंधित पार्षद और कांग्रेसी नेता/पार्षद प्रतिनिधि से पूरे घटनाक्रम पर जवाब मांग रहे हैं।
मामले ने स्थानीय राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी है। कुछ लोगों ने आने वाले चुनाव में राजनीतिक जवाब देने की बात कही है। हालांकि लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता के वोट से ही होगा, लेकिन मुफ्ती की गिरफ्तारी के बाद दोनों नेताओं की भूमिका को लेकर उठे सवाल फिलहाल चर्चा के केंद्र में हैं।
उधर मुफ्ती मुजीब के मामले को लेकर पूरे मुस्लिम समाज को निशाना बनाने वाली कथित बयानबाजी पर भी आपत्ति सामने आ रही है। समाज के लोगों का कहना है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मुकदमे और कानूनी कार्रवाई को पूरे समुदाय से जोड़ना उचित नहीं है। वहीं मेयर विकास शर्मा, विधायक शिव अरोड़ा और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ओर से सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वालों से सख्ती से निपटने की बात कही गई है।
अब मुफ्ती मुजीब अहमद न्यायिक हिरासत में हैं और आगे की लड़ाई अदालत में होगी, लेकिन राजनीतिक सवाल अभी बाकी है—मुफ्ती को बचाने का दावा करने वालों की ‘पहुंच’ आखिर काम क्यों नहीं आई? क्या एक पार्षद व कांग्रेसी नेता/पार्षद प्रतिनिधि का भरोसा मुफ्ती के लिए कानूनी राहत बना या चौकी से जेल तक पहुंचने की वजह?
इन सवालों का जवाब संबंधित नेताओं को देना है, लेकिन इतना जरूर है कि इस घटनाक्रम ने रुद्रपुर की स्थानीय राजनीति में नेतृत्व, राजनीतिक पहुंच और जिम्मेदारी को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

