

“आरक्षण महिलाओं के नाम, नेतृत्व किसके हाथ? रुद्रपुर ब्लॉक में ‘प्रधान पति–बीडीसी पति’ की मौजूदगी ने खड़े किए बड़े सवाल, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ को पीछे धकेल रहे पिता? बेटियों के अधिकार और नेतृत्व का प्रतिनिधित्व खुद संभालने की प्रवृत्ति पर छिड़ी बहस”
रुद्रपुर। रुद्रपुर विकासखंड सभागार में बुधवार को प्रस्तावित क्षेत्र पंचायत सदस्यों की बैठक उस समय चर्चा का विषय बन गई, जब पूर्व बैठकों में पारित प्रस्तावों पर कार्रवाई नहीं होने से नाराज क्षेत्र पंचायत सदस्यों और ग्राम प्रधानों ने प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ धरना शुरू कर दिया। जनप्रतिनिधियों का आरोप था कि विकास कार्यों से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव लंबे समय से लंबित हैं, जिससे गांवों का विकास प्रभावित हो रहा है। धरने के दौरान प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की गई और लंबित प्रस्तावों को शीघ्र लागू करने की मांग उठाई गई।
हालांकि, यह धरना जितना प्रशासनिक मुद्दों को लेकर चर्चा में रहा, उससे कहीं अधिक सोशल मीडिया पर एक अलग कारण से सुर्खियां बटोरने लगा। ब्लॉक परिसर से सामने आई तस्वीरों और वीडियो में बड़ी संख्या में ऐसे पुरुष दिखाई दिए, जिन्हें लोग महिला ग्राम प्रधानों और महिला क्षेत्र पंचायत सदस्यों के पति या पिता के रूप में पहचान रहे हैं। इसके बाद सोशल मीडिया पर यह बहस तेज हो गई कि आखिर जिन महिलाओं को जनता ने चुनकर पंचायतों में नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपी है, उनकी जगह सार्वजनिक मंचों, बैठकों और आंदोलनों में उनके पति या पिता क्यों दिखाई दे रहे हैं।
इसी के साथ सोशल मीडिया पर एक और सवाल तेजी से उठने लगा कि क्या “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे अभियानों की मूल भावना केवल शिक्षा तक सीमित रह गई है, या फिर बेटियों को नेतृत्व और निर्णय लेने का अधिकार भी व्यवहार में मिल पा रहा है। कई लोगों ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की जगह उनके पिता या पति ही सार्वजनिक रूप से नेतृत्व करते नजर आएंगे, तो इससे महिला सशक्तिकरण की अवधारणा कमजोर होगी और महिलाओं को मिले संवैधानिक अधिकारों का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
भारत में महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम संविधान के 73वें और 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से उठाया गया। वर्ष 1992 में किए गए इन संशोधनों के बाद ग्राम पंचायतों, क्षेत्र पंचायतों, जिला पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए न्यूनतम 33 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य किया गया। बाद में उत्तराखंड सहित कई राज्यों ने महिलाओं की भागीदारी को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से इस आरक्षण को बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया। आज उत्तराखंड में पंचायतों और अधिकांश स्थानीय निकायों में आधी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। इसका उद्देश्य केवल महिलाओं को चुनाव लड़वाना नहीं, बल्कि उन्हें विकास योजनाओं का संचालन, बजट पर निर्णय, प्रशासनिक बैठकों में भागीदारी और स्थानीय शासन का नेतृत्व सौंपना है।
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को और मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। यह व्यवस्था परिसीमन और संबंधित संवैधानिक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद लागू होगी। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान के माध्यम से बालिकाओं की शिक्षा, सुरक्षा और समान अवसर सुनिश्चित करने पर जोर दे रही है। महिला स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा देना, “लखपति दीदी” जैसी योजनाएं, महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के कार्यक्रम, कौशल विकास, स्वरोजगार, वित्तीय सहायता और विभिन्न सरकारी योजनाओं में महिलाओं की प्राथमिक भागीदारी भी इसी व्यापक सोच का हिस्सा हैं।
सरकारी सेवाओं में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए समय-समय पर विभिन्न कदम उठाए गए हैं। अलग-अलग राज्यों में पुलिस, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विभागों में महिलाओं के लिए विशेष भर्ती अभियान और आरक्षण संबंधी नीतियां लागू की गई हैं। कई राज्यों में पुलिस बल में महिलाओं की संख्या बढ़ाने के लक्ष्य तय किए गए हैं। न्यायपालिका, प्रशासन, शिक्षा, बैंकिंग, विज्ञान, तकनीक और अन्य क्षेत्रों में भी महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल रोजगार देना नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाले पदों पर भी महिलाओं की उपस्थिति सुनिश्चित करना है।
इन्हीं संवैधानिक और नीतिगत प्रयासों के बीच रुद्रपुर ब्लॉक से सामने आई तस्वीरों ने एक बार फिर उस सामाजिक मानसिकता पर बहस छेड़ दी है, जिसमें कई स्थानों पर निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की जगह उनके पति, पिता या अन्य पुरुष परिजन अधिक सक्रिय दिखाई देते हैं। सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि यदि जनता ने किसी महिला को प्रधान या क्षेत्र पंचायत सदस्य के रूप में चुना है, तो सरकारी बैठकों, धरनों, प्रशासनिक संवाद और सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी उसी महिला का नेतृत्व दिखाई देना चाहिए। तभी महिला आरक्षण का उद्देश्य सार्थक माना जाएगा।
हालांकि, यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी कार्यक्रम में किसी महिला जनप्रतिनिधि के साथ उनके पति या पिता की मौजूदगी मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उन्होंने अपने अधिकार किसी और को सौंप दिए हैं। किसी भी तस्वीर या वीडियो के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि संबंधित पुरुष आधिकारिक रूप से महिला प्रतिनिधि का स्थान ले रहे थे। यदि कहीं निर्वाचित प्रतिनिधि की जगह कोई अन्य व्यक्ति आधिकारिक निर्णय ले रहा हो या उसकी भूमिका निभा रहा हो, तो वह अलग विषय है और संबंधित प्रशासनिक या कानूनी जांच का मामला हो सकता है।
फिलहाल, रुद्रपुर विकासखंड का यह घटनाक्रम विकास कार्यों से आगे बढ़कर महिला आरक्षण, महिला नेतृत्व और महिला सशक्तिकरण की वास्तविक स्थिति पर व्यापक बहस का विषय बन गया है। यह बहस केवल रुद्रपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में इस प्रश्न को सामने लाती है कि महिलाओं को मिले संवैधानिक अधिकारों और आरक्षण का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब निर्वाचित महिला प्रतिनिधि स्वयं निर्णय प्रक्रिया का नेतृत्व करें, जनता के बीच सक्रिय रहें और लोकतंत्र में अपनी स्वतंत्र एवं प्रभावी भूमिका निभाएं। तभी “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” से आगे बढ़कर “बेटी को नेतृत्व दो, बेटी को निर्णय का अधिकार दो” की भावना भी सही मायनों में साकार हो सकेगी।




