

बिग ब्रेकिंग: ढोड़न बांध पर उग्र हुआ ‘मिट्टी सत्याग्रह’ और ‘चिता आंदोलन’, जमीन बचाने को डटे हजारों ग्रामीण।



भोपाल-मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत बन रहे ढोड़न बांध को लेकर संघर्ष लगातार तेज होता जा रहा है। छतरपुर और पन्ना क्षेत्र में आदिवासी, किसान और स्थानीय ग्रामीण अपने जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर आंदोलन कर रहे हैं।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत है इसका अनोखा और प्रतीकात्मक रूप—ग्रामीण “मिट्टी सत्याग्रह” के तहत अपने शरीर पर केन नदी की मिट्टी लगाकर यह संदेश दे रहे हैं कि यह जमीन उनकी पहचान और अस्तित्व का हिस्सा है। वहीं “चिता आंदोलन” के जरिए लोग नदी किनारे प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर “न्याय दो या मौत दो” का नारा बुलंद कर रहे हैं।
ढोड़न बांध निर्माण स्थल पर पिछले कई दिनों से हजारों लोग धरने पर बैठे हैं, जिससे परियोजना का काम भी प्रभावित हुआ है। महिलाएं बड़ी संख्या में आंदोलन की अगुवाई कर रही हैं और कई जगह मशीनों के सामने खड़े होकर निर्माण कार्य रुकवा दिया गया है।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि उन्हें उचित मुआवजा और पुनर्वास नहीं मिला, जबकि सरकार का दावा है कि प्रभावित परिवारों के लिए पैकेज तय किया गया है। इसी मुआवजे और पुनर्वास को लेकर विवाद गहराता जा रहा है और यही आंदोलन की सबसे बड़ी वजह बन गया है।
हालात इतने तनावपूर्ण हो चुके हैं कि प्रशासन को कई क्षेत्रों में प्रतिबंधात्मक आदेश लागू करने पड़े हैं। हाल ही में प्रदर्शन के दौरान टकराव जैसी स्थिति भी बनी, जिसमें अधिकारी मौके से लौटने को मजबूर हुए।
इतना ही नहीं, सैकड़ों आदिवासी पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर एरिया तक पहुंचकर विरोध दर्ज करा चुके हैं और चेतावनी दी है कि मांगें पूरी नहीं हुईं तो आंदोलन और तेज होगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या विकास की कीमत पर आदिवासियों का अस्तित्व दांव पर लगाया जा सकता है, या फिर “हमारी जमीन, हमारा अधिकार” की आवाज़ सरकार को झुकने पर मजबूर करेगी।
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