33% कमीशन, शिलापट से नाम गायब और चुनावी इशारा: क्या रुद्रपुर में शिव अरोड़ा को “निपटाने” की पटकथा, धामी नई जमीन की तलाश में और प्रशासनिक मंचों से उठते राजनीतिक संकेत लोकतंत्र के लिए खतरा?

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33% कमीशन, शिलापट से नाम गायब और चुनावी इशारा: क्या रुद्रपुर में शिव अरोड़ा को “निपटाने” की पटकथा, धामी नई जमीन की तलाश में और प्रशासनिक मंचों से उठते राजनीतिक संकेत लोकतंत्र के लिए खतरा?

“समाचार इंडिया 1” महेंद्र पाल मौर्य                               रुद्रपुर – रुद्रपुर की राजनीति इन दिनों सीधे बयान से नहीं, संकेतों से चल रही है। प्रस्तावित कॉरिडोर की शिलापट से स्थानीय विधायक शिव अरोड़ा का नाम गायब होना महज़ प्रोटोकॉल है या सियासी संदेश—यह सवाल शहर की गलियों से लेकर सत्ता के गलियारों तक तैर रहा है। उसी मंच से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का खुद चुनाव लड़ने जैसा संकेत देना चर्चा को और गहरा करता है। ऐसे में यह धारणा बन रही है कि क्या रुद्रपुर में किसी को सियासत से “निपटाने” की रणनीति आकार ले रही है।

शिलापट राजनीति में पत्थर नहीं, प्रतिष्ठा का प्रतीक होता है। उसमें नाम होना साझेदारी और स्वीकृति का संकेत है। नाम का अभाव सिर्फ औपचारिक चूक नहीं माना जाता, बल्कि शक्ति-संतुलन में बदलाव की आहट के रूप में पढ़ा जाता है। यदि सब सामान्य है तो नाम क्यों नहीं? और यदि असामान्य है तो दूरी किस स्तर पर है? यही सवाल रुद्रपुर की राजनीतिक हवा को भारी बना रहे हैं।

कथित 33 प्रतिशत कमीशन से जुड़ी ऑडियो चर्चा ने इस माहौल को और अस्थिर कर दिया है। प्रमाणिकता जांच के अधीन हो सकती है, लेकिन राजनीति में आरोप भी पर्याप्त होते हैं छवि को प्रभावित करने के लिए। यदि जांच में कुछ पुष्ट होता है तो 2027 की राह कठिन हो सकती है; यदि नहीं, तो साजिश का नैरेटिव तैयार होगा। पर अभी के लिए विवाद ने भरोसे पर असर जरूर डाला है।

मुख्यमंत्री के संभावित चुनावी संकेत को भी कई अर्थों में देखा जा रहा है। यदि नेतृत्व अपने ही गढ़ से अलग विकल्प तलाशता दिखे, तो यह रणनीतिक विस्तार हो सकता है, पर स्थानीय स्तर पर इसे असहजता के संकेत के रूप में भी पढ़ा जा रहा है। उत्तराखंड की राजनीति में सीट बदलना सिर्फ भौगोलिक निर्णय नहीं, बल्कि संदेशात्मक कदम होता है। ऐसे में रुद्रपुर की पुरानी राजनीतिक स्मृतियां और नए समीकरण आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं।

स्थानीय निकाय की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। मेयर विकास शर्मा के नेतृत्व में विकास के दावे किए जाते हैं, लेकिन आलोचक पारदर्शिता और निर्णय प्रक्रिया पर प्रश्न उठाते हैं। जब प्रशासनिक मंचों से राजनीतिक संकेत मिलने लगें, तो लोकतांत्रिक ढांचे की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि शासन और राजनीति की रेखाएं स्पष्ट दिखें, धुंधली नहीं।

रुद्रपुर की जनता के लिए असली मुद्दे विकास, रोजगार और जवाबदेही हैं। पर फिलहाल चर्चा प्रतीकों, संकेतों और आरोपों के इर्द-गिर्द घूम रही है। यह कहना अभी अतिशयोक्ति होगा कि किसी को औपचारिक रूप से “निपटाने” का निर्णय हो चुका है, लेकिन यह स्पष्ट है कि सियासी दबाव और अंदरूनी हलचल तेज है। 2027 भले दूर हो, पर उसकी पटकथा के शुरुआती दृश्य रुद्रपुर में लिखे जाते दिख रहे हैं। अब जनता की निगाह इस बात पर है कि संकेतों की राजनीति जवाबदेही में बदलेगी या सिर्फ सत्ता के नए समीकरण गढ़े जाएंगे।

Mahendra Pal