जंगलों के बीच आस्था और इतिहास की अमिट गाथा: नैनीताल का 180 वर्ष पुराना सेंट जॉन इन द वाइल्डरनेस चर्च
महेंद्र पाल मौर्य, समाचार इंडिया 1 नैनीताल -नैनीताल की हरी-भरी पहाड़ियों और देवदार के घने जंगलों के बीच स्थित सेंट जॉन इन द वाइल्डरनेस चर्च न केवल शहर की सबसे प्राचीन इमारतों में से एक है, बल्कि यह आस्था, इतिहास और औपनिवेशिक विरासत का जीवंत प्रतीक भी है।
करीब 180 वर्ष पुराना यह चर्च आज भी अपनी शांति, गरिमा और ऐतिहासिक महत्व के कारण स्थानीय लोगों और देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
इस ऐतिहासिक चर्च की नींव वर्ष 1846 में तत्कालीन कलकत्ता के बिशप डैनियल विल्सन द्वारा रखी गई थी। कहा जाता है कि बिशप विल्सन ने 1844 में इस स्थान को चर्च निर्माण के लिए चुना था। उस समय यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ था और बेहद शांत माना जाता था। 2 अप्रैल 1848 को चर्च का उद्घाटन किया गया, हालांकि उस समय तक इसका निर्माण पूर्ण रूप से पूरा नहीं हो पाया था। इसके बावजूद, यह चर्च नैनीताल में ईसाई समुदाय की धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया।
चर्च के नाम के पीछे भी एक रोचक किंवदंती जुड़ी हुई है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बिशप डैनियल विल्सन एक बार अस्वस्थ हो गए थे और स्वास्थ्य लाभ के लिए उन्होंने इसी घने जंगल वाले इलाके में बनी एक झोपड़ी में कुछ समय बिताया था। इसी “वाइल्डरनेस” यानी जंगल से जुड़े अनुभव के कारण इस चर्च का नाम ‘सेंट जॉन इन द वाइल्डरनेस’ पड़ा, जिसका अर्थ है—जंगल के बीच स्थित सेंट जॉन चर्च।
वास्तुकला की दृष्टि से यह चर्च गोथिक शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। पत्थरों से निर्मित इसकी ऊँची संरचना, नुकीले मेहराब, ढलवां छत और रंगीन कांच की सुंदर खिड़कियाँ औपनिवेशिक युग की याद दिलाती हैं। अंदर प्रवेश करते ही एक अलग ही शांति का अनुभव होता है, जहाँ धूप रंगीन शीशों से छनकर आती है और वातावरण को आध्यात्मिक बना देती है।
इस चर्च का संबंध प्रसिद्ध शिकारी, लेखक और प्रकृतिवादी जिम कॉर्बेट से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। जिम कॉर्बेट इस चर्च के नियमित अनुयायी थे। चर्च परिसर में बने कब्रिस्तान में उनके माता-पिता क्रिस्टोफर विलियम कॉर्बेट और मैरी जेन कॉर्बेट की कब्रें आज भी मौजूद हैं, जो इस स्थान को ऐतिहासिक दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण बना देती हैं।
चर्च के भीतर वर्ष 1880 के भीषण भूस्खलन की एक मार्मिक स्मृति भी संजोकर रखी गई है। उस प्राकृतिक आपदा में बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई थी। उन पीड़ितों की याद में चर्च के अंदर एक स्मारक पट्टिका स्थापित की गई है, जो नैनीताल के इतिहास के उस दर्दनाक अध्याय की गवाही देती है।
चर्च परिसर का कब्रिस्तान भी अपने आप में इतिहास की एक खुली किताब है। यहाँ 1845 से 1922 के बीच की कई पुरानी कब्रें मौजूद हैं। इनमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सर जॉर्ज नॉक्स सहित कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों की कब्रें शामिल हैं, जो उस दौर के सामाजिक और प्रशासनिक इतिहास की झलक देती हैं।
घने देवदार के पेड़ों, पक्षियों की चहचहाहट और चारों ओर फैली हरियाली के बीच स्थित यह चर्च आज भी शांति, ध्यान और आत्मिक सुकून का केंद्र बना हुआ है। यही कारण है कि सेंट जॉन इन द वाइल्डरनेस चर्च केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि नैनीताल की पहचान, उसकी औपनिवेशिक विरासत और प्राकृतिक सौंदर्य का एक अमूल्य हिस्सा है, जिसे देखने और महसूस करने के लिए हर साल हजारों लोग यहाँ पहुंचते हैं।
