*यूपी में कुत्तों को भी उम्रकैद की सजा! कानपुर की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक जाएगी?**

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**यूपी में कुत्तों को भी उम्रकैद की सजा!

कानपुर की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक जाएगी?**

उत्तर प्रदेश के कानपुर में लागू की गई “जीरो टॉलरेंस” नीति अब केवल एक नगर निगम का फैसला नहीं रह गई है, बल्कि यह उस मुकाम पर पहुंच चुकी है जहां से इसका अगला पड़ाव सुप्रीम कोर्ट माना जा रहा है। दो बार या उससे अधिक लोगों को काटने वाले कुत्तों को एबीसी सेंटर में आजीवन रखने का निर्णय जिस तेजी से लागू हुआ, उसी तेजी से इस पर सवाल भी उठने लगे हैं। यह नीति अब इस बुनियादी सवाल से टकरा रही है कि क्या जन-सुरक्षा के नाम पर किसी जानवर को स्थायी रूप से स्वतंत्रता से वंचित किया जा सकता है।

कानपुर में लगातार बढ़े कुत्तों के हमलों, बच्चों और बुजुर्गों पर हुई घटनाओं और अस्पतालों में रेबीज के मामलों ने प्रशासन को कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर किया। नगर निगम ने साफ कर दिया कि जो कुत्ता बार-बार इंसानों के लिए खतरा बनेगा, उसे समाज से अलग रखा जाएगा। यही फैसला आम जनता के बड़े हिस्से को राहत देता दिखा, लेकिन इसी के साथ इसने एक बड़ा संवैधानिक टकराव भी खड़ा कर दिया।

कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है तो अदालत के सामने सबसे पहले यह तय करना होगा कि किसी नगर निगम को “आजीवन confinement” जैसा अधिकार है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले साफ कहते हैं कि आवारा कुत्तों की समस्या का समाधान नसबंदी, टीकाकरण और वैज्ञानिक पुनर्वास से होना चाहिए, न कि दंडात्मक नजरिए से। ऐसे में अदालत को यह देखना होगा कि क्या कानपुर की नीति इन निर्देशों से टकराती है या जन-सुरक्षा के नाम पर इससे अलग रास्ता अपनाया जा सकता है।

दूसरा बड़ा सवाल यह होगा कि अगर अदालत ने इस नीति को सही ठहराया, तो इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे। जानकारों के मुताबिक ऐसा फैसला देश के अन्य शहरों के लिए एक नया रास्ता खोल सकता है, जहां स्थानीय प्रशासन “खतरनाक जानवर” की अपनी परिभाषा तय कर आजीवन confinement जैसे फैसले लेने लगेगा। यह शहरी प्रशासन के अधिकारों का विस्तार होगा, लेकिन साथ ही पशु अधिकार कानूनों की सीमाएं भी नए सिरे से परिभाषित होंगी।

तीसरा और सबसे अहम परिदृश्य यह है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने इस नीति को रद्द या सीमित कर दिया, तो प्रशासन के सामने एक बार फिर वही पुरानी चुनौती खड़ी हो जाएगी—जनता को तत्काल सुरक्षा कैसे दी जाए। ऐसी स्थिति में सवाल उठेगा कि क्या मौजूदा एबीसी सिस्टम वास्तव में प्रभावी है या फिर सरकारों को आवारा पशुओं को लेकर एक नई राष्ट्रीय नीति लानी पड़ेगी। अदालत अगर सख्त टिप्पणी करती है तो यह फैसला भविष्य में ऐसे किसी भी “जीरो टॉलरेंस” मॉडल पर ब्रेक लगाने वाला साबित हो सकता है।

राजनीतिक रूप से यह मुद्दा पहले ही दो हिस्सों में बंट चुका है। सत्ता पक्ष इसे जनता की सुरक्षा और मजबूत शासन की मिसाल के रूप में पेश कर रहा है, जबकि विपक्ष और सामाजिक संगठन इसे कानून और करुणा के बीच संतुलन बिगाड़ने वाला फैसला बता रहे हैं। साफ है कि यह बहस अब सिर्फ कानपुर तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह तय करेगी कि भारत में शहरी सुरक्षा और पशु अधिकारों के बीच संतुलन की रेखा आखिर खिंचेगी कहां।

  • फिलहाल कानपुर की “जीरो टॉलरेंस” नीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां से या तो यह पूरे देश के लिए नया मॉडल बनेगी या फिर सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर इसे नए सिरे से गढ़ा जाएगा। सवाल यही है कि क्या भारतीय न्याय व्यवस्था “खतरनाक जानवर” की अवधारणा को कानूनी मान्यता देगी या फिर करुणा, कानून और वैज्ञानिक प्रबंधन के पुराने रास्ते को ही अंतिम समाधान मानेगी। इसका जवाब आने वाला वक्त देगा, लेकिन इतना तय है कि यह मामला सिर्फ कुत्तों का नहीं, शासन की दिशा तय करने वाला