अतिक्रमण की आड़ में ‘इंदिरा गांधी’ का अपमान? मूर्ति हटाकर इंदिरा चौक को बनाया ‘त्रिशूल चौक’, क्या मेयर विकास शर्मा इतिहास पर चला रहे बुलडोज़र?

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अतिक्रमण की आड़ में ‘इंदिरा गांधी’ का अपमान? मूर्ति हटाकर इंदिरा चौक को बनाया ‘त्रिशूल चौक’, क्या मेयर विकास शर्मा इतिहास पर चला रहे बुलडोज़र?

 

रुद्रपुर -रुद्रपुर की सियासत इस समय अपने सबसे संवेदनशील मोड़ पर खड़ी है। जिस इंदिरा चौक ने दशकों तक शहर की पहचान, स्मृति और राजनीतिक विरासत को संजोए रखा, वह अब इतिहास बनता दिख रहा है। अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के नाम पर पहले पूर्व प्रधानमंत्री और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी की मूर्ति हटाई गई और फिर उसी स्थान पर त्रिशूल स्थापित कर उसे “त्रिशूल चौक” घोषित कर दिया गया। यह सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि शहर को समझने और प्रतिक्रिया देने का अवसर तक नहीं मिला। अब 14 तारीख को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के हाथों प्रस्तावित उद्घाटन ने इस पूरे घटनाक्रम को खुली राजनीतिक स्वीकृति दे दी है।

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इंदिरा गांधी की मूर्ति वास्तव में अतिक्रमण थी, या फिर अतिक्रमण की परिभाषा को सुविधानुसार इस्तेमाल किया गया। वर्षों से स्थापित प्रतिमा, जो प्रशासन और नगर निगम की जानकारी में थी, अचानक बाधा कैसे बन गई। यदि यातायात या सौंदर्यीकरण की आवश्यकता थी तो क्या प्रतिमा को सम्मानपूर्वक किसी अन्य प्रमुख स्थल पर स्थापित करने की पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई गई। या फिर यह निर्णय पहले से तय राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा था जिसमें इतिहास के एक अध्याय को हटाकर नई वैचारिक पहचान स्थापित करनी थी।

मेयर विकास शर्मा की कार्यशैली पर अब खुलकर सवाल उठ रहे हैं। आरोप लग रहे हैं कि शहर के ज्वलंत मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए प्रतीकों की राजनीति को हथियार बनाया जा रहा है। रुद्रपुर आज भी जाम की समस्या, जलभराव, टूटी सड़कों, बढ़ते अतिक्रमण और बेरोजगारी जैसी मूलभूत चुनौतियों से जूझ रहा है। लेकिन इन समस्याओं पर ठोस और प्रभावी कार्रवाई की बजाय ऐतिहासिक स्थलों और धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से नई बहस छेड़ दी गई है। क्या यह प्रशासनिक प्राथमिकताओं का असंतुलन नहीं दर्शाता।

मामला यहीं नहीं रुकता। इससे पहले मासूम शाह के मियां का मजार भी हटाया गया, जिसे स्थानीय लोग अपनी आस्था से जोड़कर देखते थे। अब इंदिरा चौक की पहचान को समाप्त कर त्रिशूल की स्थापना करना यह संकेत देता है कि शहर की सांस्कृतिक संरचना को एक खास दिशा में मोड़ा जा रहा है। समर्थक इसे सांस्कृतिक पुनर्जागरण कह रहे हैं, लेकिन विरोधियों के लिए यह साझा विरासत पर एकतरफा निर्णय है। रुद्रपुर जैसे बहु-सांस्कृतिक शहर में ऐसे कदम सामाजिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इंदिरा गांधी जैसी राष्ट्रीय नेता की प्रतिमा हटाना केवल स्थानीय प्रशासनिक निर्णय नहीं माना जा सकता। यह प्रतीकात्मक राजनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य वैचारिक संदेश देना है। जब इस पूरे प्रकरण को मुख्यमंत्री स्तर का संरक्षण और मंच मिल रहा है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि मामला केवल नगर निगम की सीमाओं में सिमटा नहीं है, बल्कि व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।

शहर के वरिष्ठ नागरिकों और लंबे समय से रह रहे परिवारों के लिए इंदिरा चौक केवल एक नाम नहीं था, बल्कि पीढ़ियों की यादों का केंद्र था। वहां की प्रतिमा बच्चों को देश के राजनीतिक इतिहास से परिचित कराती थी। आज जब उसी स्थान पर त्रिशूल स्थापित कर नया नाम दिया गया है, तो यह केवल संरचना का बदलाव नहीं, बल्कि स्मृतियों का विस्थापन भी है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में जनभावनाओं को दरकिनार कर इस तरह के निर्णय थोपे जाने चाहिए।

मेयर विकास शर्मा अब सीधे राजनीतिक आलोचना के केंद्र में हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने व्यापक जनसंवाद से बचते हुए एकतरफा फैसला लिया। क्या नगर निगम ने कोई सार्वजनिक बैठक की, क्या स्थानीय नागरिकों से राय ली गई, क्या विपक्ष को विश्वास में लिया गया। यदि नहीं, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अनदेखी नहीं तो और क्या है।

14 तारीख को जब त्रिशूल चौक का उद्घाटन होगा, तब मंच पर भाषण होंगे, विकास और संस्कृति की बातें होंगी, लेकिन जमीन पर यह सवाल गूंजता रहेगा कि क्या विकास के नाम पर इतिहास को हटाया जा सकता है। क्या अतिक्रमण की परिभाषा इतनी लचीली हो गई है कि उसमें स्मारक और स्मृतियां भी शामिल हो जाएं। और सबसे अहम, क्या शहर की पहचान बदलने का अधिकार केवल सत्ता के पास है, या उस जनता के पास भी है जिसने दशकों तक इन प्रतीकों को अपनाया और सम्मान दिया।

रुद्रपुर आज एक चौराहे पर खड़ा है, जहां केवल रास्ते नहीं बदल रहे, बल्कि विचार और दृष्टिकोण भी बदल रहे हैं। आने वाले समय में यह तय होगा कि यह निर्णय शहर को एक नई दिशा देता है या फिर राजनीतिक टकराव और सामाजिक विभाजन की नई रेखाएं खींचता है। फिलहाल इतना तय है कि इंदिरा चौक से त्रिशूल चौक तक की यह यात्रा केवल नाम परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि सत्ता, प्रतीक और स्मृति के टकराव की गाथा बन चुकी है।

Mahendra Pal