सियासत की शह और सलाखों की सज़ा: मेयर विकास शर्मा–विधायक शिव अरोड़ा के समर्थन ने क्या अरविंद शर्मा को पहुंचा दिया जेल की दहलीज तक?
रुद्रपुर -रुद्रपुर की राजनीति इन दिनों एक ऐसे प्रकरण के केंद्र में है जिसने धार्मिक आस्था, उग्र बयानबाज़ी और सियासी समर्थन के रिश्तों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अटरिया देवी मंदिर के पुजारी अरविंद शर्मा का नाम उस वक्त सुर्खियों में आया जब नमाज़ पढ़ रहे एक व्यक्ति के साथ कथित मारपीट का वीडियो वायरल हुआ। घटना ने देखते ही देखते राजनीतिक रंग ले लिया और मामला थाने से लेकर जनसभाओं तक चर्चा का विषय बन गया। वीडियो के आधार पर मुकदमा दर्ज हुआ, लेकिन विवाद यहीं थमने वाला नहीं था। उनकी पूर्व पत्नी सरिता सक्सेना ने फोन पर जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद दूसरी एफआईआर कायम हुई और कानूनी शिकंजा और कस गया। हालात ऐसे बने कि अरविंद शर्मा को आत्मसमर्पण करना पड़ा और अब वे न्यायिक हिरासत में हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान उनकी तीखी बयानबाज़ी लगातार चर्चा में रही। मंदिर परिसर के आसपास नमाज़ पढ़े जाने का उन्होंने मुखर विरोध किया और इसे धार्मिक उन्माद की साजिश बताया। कई हिंदू संगठनों के साथ उन्होंने प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग की। विरोध का यह स्वर धीरे-धीरे राजनीतिक समर्थन में बदलता गया और यहीं से सियासत की सक्रिय भूमिका खुलकर सामने आई।
रुद्रपुर के मेयर विकास शर्मा और विधायक शिव अरोड़ा ने सार्वजनिक मंचों पर उनका समर्थन किया। यह समर्थन एक तरफ उनके समर्थकों के लिए शक्ति प्रदर्शन था, तो दूसरी ओर आलोचकों के लिए राजनीतिक ध्रुवीकरण का संकेत। लेकिन जैसे ही निजी जीवन से जुड़े गंभीर आरोप सामने आए और दूसरी एफआईआर दर्ज हुई, समर्थन की राजनीति के बीच अरविंद शर्मा अकेले कानूनी प्रक्रिया का सामना करते दिखाई दिए। यहीं से शहर में यह सवाल गूंजने लगा कि क्या उग्र रुख अपनाने वाले युवा धार्मिक नेताओं को सियासी शह तो मिलती है, लेकिन संकट की घड़ी में वही नेता खुद को असहाय पाते हैं।
रुद्रपुर पहले भी सांप्रदायिक तनाव की आग झेल चुका है। ऐसे में धार्मिक मुद्दों पर आक्रामक राजनीति को लेकर शहर के प्रबुद्ध वर्ग में चिंता स्वाभाविक है। महाबोध यही है कि राजनीतिक मंचों की तालियाँ और सार्वजनिक समर्थन क्षणिक हो सकते हैं, परंतु कानून की प्रक्रिया स्थायी और कठोर होती है। समर्थन देने वाले चेहरे सुरक्षित दायरे में रहते हैं, जबकि उग्र कदम उठाने वाला व्यक्ति सीधे कानूनी परिणामों का भागीदार बनता है।
अरविंद शर्मा की गिरफ्तारी ने यह विमर्श और गहरा कर दिया है कि क्या युवा हिंदू नेताओं को भावनात्मक आवेश में आगे बढ़ाकर सियासी लाभ लिया जा रहा है। क्या यह समर्थन दरअसल एक ऐसी चाल है जिसमें मोहरा आगे बढ़ता है और खेल कोई और खेलता है। यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति का है जो धार्मिक असहमति को राजनीतिक अवसर में बदल देती है।
आज जब मामला न्यायिक प्रक्रिया में है, तब सबसे महत्वपूर्ण है शहर की शांति और सामाजिक संतुलन। यदि बयानबाज़ी और टकराव की राजनीति जारी रही तो उसका दुष्परिणाम आम नागरिकों को भुगतना पड़ेगा। सियासत अपने समीकरण बदल लेगी, पर समाज को जो घाव मिलेंगे, वे लंबे समय तक भर नहीं पाएंगे। यही वह क्षण है जब रुद्रपुर को तय करना है कि उसे उग्र नारों की राह पर चलना है या संयम और सद्भाव की दिशा में आगे बढ़ना है।
