तलवार से धम्म तक सम्राट अशोक की ऐतिहासिक यात्रा! अशोक विजयदशमी और अशोक अष्टमी का क्या है रहस्य, जानिए कलिंग युद्ध से डॉ. अंबेडकर की दीक्षाभूमि तक की पूरी कहानी
विशेष लेख | इतिहास, धर्म और सामाजिक परिवर्तन की अनूठी गाथा
भारत में दशहरा यानी विजयादशमी को जहां हिंदू परंपरा में भगवान श्रीराम की रावण पर विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है, वहीं बौद्ध समुदाय के एक बड़े हिस्से में यह दिन अशोक विजयदशमी और धम्मचक्र परिवर्तन दिवस के रूप में विशेष महत्त्व रखता है। इन परंपराओं के केंद्र में प्राचीन भारत के महान मौर्य सम्राट अशोक, कलिंग युद्ध, बौद्ध धम्म का प्रसार और डॉ. भीमराव अंबेडकर का ऐतिहासिक धर्म परिवर्तन शामिल हैं। हालांकि अशोक विजयदशमी और अशोक अष्टमी दो अलग-अलग पर्व हैं, जिनकी धार्मिक परंपराएं और ऐतिहासिक संदर्भ भी अलग हैं।
सम्राट अशोक और कलिंग युद्ध का इतिहास: मौर्य वंश के सम्राट अशोक ने लगभग 268 से 232 ईसा पूर्व तक शासन किया। वे चंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र और बिंदुसार के पुत्र थे। उनके शासनकाल में मौर्य साम्राज्य का व्यापक विस्तार हुआ। लगभग 261 ईसा पूर्व हुए कलिंग युद्ध ने उनके जीवन की दिशा बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अशोक के तेरहवें प्रमुख शिलालेख में युद्ध के दौरान लगभग एक लाख लोगों के मारे जाने, डेढ़ लाख लोगों को निर्वासित किए जाने और इससे भी अधिक लोगों की मृत्यु का उल्लेख मिलता है। युद्ध की भयावहता से व्यथित अशोक ने सैन्य विजय की अपेक्षा धम्म विजय, नैतिकता, करुणा और लोककल्याण को अधिक महत्त्व देना शुरू किया। उनके अभिलेखों में अहिंसा, धार्मिक सहिष्णुता, प्रजा के कल्याण और सभी संप्रदायों के प्रति सम्मान का संदेश मिलता है। हालांकि अशोक ने ठीक विजयादशमी के दिन बौद्ध धर्म ग्रहण किया था, इसका स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
अशोक विजयदशमी क्यों मनाई जाती है? बौद्ध परंपरा में अशोक विजयदशमी को सम्राट अशोक के धम्म की ओर परिवर्तन और बौद्ध धर्म के प्रसार की स्मृति से जोड़ा जाता है। इस दिन बौद्ध विहारों में बुद्ध वंदना, त्रिशरण-पंचशील, धम्म चर्चा और सामाजिक समानता से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। अहिंसा, मैत्री, करुणा, प्रज्ञा और भाईचारे का संदेश इस पर्व का प्रमुख भाव है। यह परंपरा विजय के अर्थ को केवल युद्ध में जीत तक सीमित न रखकर स्वयं में परिवर्तन और नैतिक मूल्यों की स्थापना से जोड़ती है।
14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में ऐतिहासिक धम्मचक्र परिवर्तन: अशोक विजयदशमी और बौद्ध समाज के आधुनिक इतिहास में डॉ. भीमराव अंबेडकर का विशेष स्थान है। 14 अक्टूबर 1956 को विजयादशमी के अवसर पर नागपुर की दीक्षाभूमि में डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया। बौद्ध भिक्षु भदंत चंद्रमणि ने उन्हें त्रिशरण और पंचशील ग्रहण कराया, जिसके बाद उन्होंने अपने अनुयायियों को भी बौद्ध धम्म की दीक्षा दी। जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता के विरुद्ध संघर्ष करने वाले डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म को समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, विवेक और मानवीय गरिमा पर आधारित जीवन-दर्शन के रूप में अपनाया। इस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में 14 अक्टूबर को देशभर में अनेक बौद्ध समुदाय धम्मचक्र परिवर्तन दिवस मनाते हैं। नागपुर की दीक्षाभूमि पर इस अवसर पर बड़ी संख्या में अनुयायी जुटते हैं।
अशोक अष्टमी क्या है? अशोक विजयदशमी से अलग, अशोक अष्टमी हिंदू पंचांग के चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला पर्व है। इसका संबंध अशोक वृक्ष की पूजा, शोक से मुक्ति की धार्मिक कामना और विभिन्न क्षेत्रीय परंपराओं से है। कुछ परंपराओं में अशोक की कोमल कलियों या पत्तियों के सेवन की विधि को ‘अशोक कलिका प्राशन’ कहा जाता है। ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर स्थित प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर में इस अवसर पर रुकुना रथयात्रा निकाली जाती है, जिसमें भगवान लिंगराज की उत्सव प्रतिमा को रथ पर बैठाकर रामेश्वर मंदिर तक ले जाया जाता है। रामायण की कुछ लोकमान्यताओं में अशोक वाटिका और माता सीता से हनुमान जी की भेंट का उल्लेख भी इस पर्व से जोड़ा जाता है, लेकिन इसे अशोक अष्टमी की निश्चित ऐतिहासिक घटना नहीं माना जा सकता।
दोनों पर्वों में क्या अंतर है? अशोक विजयदशमी का आधुनिक बौद्ध संदर्भ सम्राट अशोक की धम्म नीति और डॉ. अंबेडकर के धर्म परिवर्तन की स्मृति से जुड़ा है, जबकि अशोक अष्टमी चैत्र शुक्ल अष्टमी को मनाया जाने वाला हिंदू धार्मिक पर्व है। दोनों के नाम में ‘अशोक’ शब्द होने के बावजूद इनके बीच प्रत्यक्ष ऐतिहासिक संबंध प्रमाणित नहीं है। इसी तरह सम्राट अशोक द्वारा विजयादशमी के दिन बौद्ध धर्म ग्रहण करने की बात को स्थापित ऐतिहासिक तथ्य के बजाय प्रचलित मान्यता के रूप में समझना चाहिए।
निष्कर्ष: सम्राट अशोक की विरासत हमें बताती है कि सत्ता और युद्ध से मिली विजय की तुलना में करुणा, नैतिकता और लोककल्याण अधिक स्थायी महत्त्व रखते हैं। डॉ. अंबेडकर ने इसी बौद्ध धम्म को आधुनिक भारत में सामाजिक समानता और आत्मसम्मान की दृष्टि से नई दिशा दी। अशोक विजयदशमी और धम्मचक्र परिवर्तन दिवस इस विचार को आगे बढ़ाते हैं, जबकि अशोक अष्टमी भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। दोनों पर्व अपने अलग-अलग ऐतिहासिक और धार्मिक संदर्भों में शांति, कल्याण और बेहतर समाज की प्रेरणा देते हैं।
तलवार से धम्म तक सम्राट अशोक की ऐतिहासिक यात्रा! अशोक विजयदशमी और अशोक अष्टमी का क्या है रहस्य, जानिए कलिंग युद्ध से डॉ. अंबेडकर की दीक्षाभूमि तक की पूरी कहानी विशेष लेख | इतिहास, धर्म और सामाजिक परिवर्तन की अनूठी गाथा
