*रुद्रपुर के विधायक और मेयर कर देंगे भाजपा का बंटाधार। संगठन बनाम चाटुकारिता से भाजपा में उभरती नई परंपराओं पर उठते सवाल, रुद्रपुर से प्रदेश तक मंथन की ज़रूरत | पहले कोमल के उगते सूरज को लगाया राहु दोष, अब किच्छा में भाजपा को लग सकता है केतु *
रुद्रपुर – एक दौर था जब राजनीतिक दलों की दिशा और दशा संगठन तय करता था और कार्यकर्ता पार्टी की रीढ़ माने जाते थे, लेकिन समय के साथ यह तस्वीर तेजी से बदलती नजर आ रही है। आज संगठन से अधिक महत्व जनप्रतिनिधियों की चाटुकारिता को मिलता दिख रहा है, जिसके सहारे पद और प्रभाव हासिल करने की होड़ ने पार्टी के भीतर एक नई और चिंताजनक परंपरा को जन्म दिया है। स्थिति यह है कि चार वर्ष पहले कांग्रेस छोड़कर आए व्यक्ति को भाजपा संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी जाती है, जबकि वर्षों से जमीन पर पसीना बहाने वाला, निष्ठावान और कर्मठ कार्यकर्ता आज भी प्रतीक्षा की कतार में खड़ा रह जाता है। इसका सीधा असर उन सैकड़ों कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ रहा है, जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के पार्टी को मजबूत करने में अपनी ऊर्जा और समय लगाया। यह ऐसा विषय है, जिस पर पार्टी हाईकमान को गंभीर आत्ममंथन करने की आवश्यकता है।
इसी पृष्ठभूमि में भाजपा ओबीसी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष नेत्रपाल मौर्य द्वारा रुद्रपुर शहर में आयोजित कार और बाइक रैली ने संगठनात्मक राजनीति को लेकर एक अलग और सकारात्मक संदेश दिया। इस रैली में पार्टी संगठन के सक्रिय और जमीनी चेहरों को आगे रखकर नेतृत्व कराया गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि संगठन को प्राथमिकता देने की सोच अब भी जिंदा है। संगठन की भूमिका को केंद्र में लाया गया। अनुशासन और मर्यादा के साथ निकली यह रैली यह संकेत देने के लिए काफी थी कि यदि इच्छाशक्ति हो तो संगठन को फिर से उसका सम्मान लौटाया जा सकता है।
दूसरी ओर रुद्रपुर के स्थानीय जनप्रतिनिधि सार्वजनिक मंचों से भारतीय जनता पार्टी को मजबूत बनाने के दावे करते नजर आते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की नीतियों की प्रशंसा करते नहीं थकते, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इन दावों से मेल नहीं खाती। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के कार्यक्रम में, जहां स्वयं भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष मौजूद रहे, वहां स्थानीय विधायक, मेयर और अन्य जनप्रतिनिधियों का न पहुंचना कई सवाल खड़े करता है। इससे भी अधिक गंभीर आरोप यह हैं कि कार्यकर्ताओं को भी उस कार्यक्रम में शामिल होने से रोका गया। सवाल यह उठता है कि क्या इस तरह की आपसी खींचतान, प्रतिस्पर्धा और टांग खींचने की राजनीति से पार्टी वास्तव में मजबूत हो सकती है।
विधायक और मेयर के बीच चल रही आपसी खींचतान का असर केवल संगठन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका सीधा फायदा विपक्षी कांग्रेस को मिलता दिखाई दिया। पहले त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों और फिर नगर निगम चुनावों में कांग्रेस से कथित साठगांठ की चर्चाएं सामने आईं। आरोप यह लगे कि व्यक्तिगत समीकरणों के चलते अपनी ही पार्टी के उम्मीदवारों को कमजोर किया गया और ऐसे प्रत्याशियों को जिताने में भूमिका निभाई गई, जो कांग्रेस से जुड़े हुए थे। खुद को भाजपा का निष्ठावान सिपाही बताने वाले कुछ जनप्रतिनिधियों की इस भूमिका ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया और संगठन को इसकी कीमत चुकानी पड़ी।
रुद्रपुर की राजनीति में कोमल चौधरी जैसे उगते हुए राजनीतिक चेहरे पर ग्रहण लगने की चर्चा भी इन्हीं अंदरूनी कलहों से जोड़कर देखी जा रही है। राजनीतिक गलियारों में यह तंज अब आम होता जा रहा है कि पहले कोमल के उगते सूरज को राहु दोष लगा और अब यही हाल किच्छा में भाजपा के साथ केतु बनकर सामने आ सकता है। 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर किच्छा में भाजपा की संभावनाओं पर भी इसी कारण प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं। लगातार हिंदू-मुस्लिम और अल्पसंख्यकों को लेकर अमर्यादित भाषा का प्रयोग पार्टी के लिए लाभ से अधिक नुकसानदेह साबित हो रहा है और इससे भाजपा का पारंपरिक समर्थक वर्ग भी असहज महसूस कर रहा है।
यदि यही सिलसिला चलता रहा, अपनी ही पार्टी के नेताओं को निशाना बनाया जाता रहा और कार्यकर्ताओं को भ्रम और असमंजस की स्थिति में छोड़ा गया, तो आने वाले समय में भारतीय जनता पार्टी की स्थिति क्या होगी, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं बल्कि चिंताजनक है। प्रदेश में जिस तरह भाजपा सरकार के खिलाफ माहौल बनने की चर्चाएं हैं, ऐसे में संगठन को कमजोर करने वाले आंतरिक कारक पार्टी को और अधिक कठघरे में खड़ा कर सकते हैं। अब समय आ गया है कि पार्टी नेतृत्व चाटुकारिता की संस्कृति पर अंकुश लगाए, जमीनी कार्यकर्ताओं को उनका हक और सम्मान दे और संगठन को फिर से वही ताकत बनाए, जिसके बल पर भाजपा ने देश और प्रदेश में अपनी मजबूत पहचान स्थापित की थी।
