*क्या तराई में भाजपा का किला दरक रहा है?* *कांग्रेस के उभार और बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच 2027 की असली परीक्षा*

खबरें शेयर करें -

*क्या तराई में भाजपा का किला दरक रहा है?*

 

*कांग्रेस के उभार और बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच 2027 की असली परीक्षा*

 

(पार्ट–2 विश्लेषण)

 

✍️ Mahendra pal maurya

रुद्रपुर

उत्तराखंड की तराई हमेशा से सत्ता के गणित को बदलने वाली ज़मीन रही है। यहां के चुनाव सिर्फ स्थानीय प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं होते, बल्कि यह तय करते हैं कि प्रदेश की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी। 2027 के करीब आते-आते तराई में जो सियासी हलचल दिख रही है, उसने भाजपा और कांग्रेस—दोनों के सामने नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस वाकई भाजपा पर भारी पड़ने की स्थिति में आ रही है, या फिर भाजपा एक बार फिर अपने संगठन, सत्ता और चेहरे के दम पर बाज़ी पलट देगी।

 

रुद्रपुर से लेकर सीमावर्ती इलाकों तक भाजपा लंबे समय तक जिस मज़बूती के भरोसे राजनीति करती रही, उसी मज़बूती में अब दरारें साफ दिखाई देने लगी हैं। शहरीकरण, व्यापार और प्रशासनिक मौजूदगी ने भाजपा को बढ़त जरूर दी, लेकिन व्यापारी वर्ग में बढ़ता असंतोष, धार्मिक-सामाजिक तनाव और स्थानीय नेतृत्व को लेकर उठते सवालों ने मुकाबले को आसान नहीं रहने दिया। यदि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तराई की किसी सीट से उतरते हैं, तो भाजपा को चेहरे का सीधा लाभ मिलेगा, लेकिन इसके साथ ही स्थानीय नाराजगी भी सीधे उसी चेहरे से जुड़ जाएगी। यह जोखिम और अवसर—दोनों एक साथ लेकर आने वाला फैसला होगा।

 

किच्छा जैसे क्षेत्रों में तस्वीर और ज्यादा जटिल नजर आती है। कांग्रेस विधायक तिलकराज बेहड़ की जमीनी पकड़ और भाजपा के भीतर चल रही खींचतान ने मुकाबले को पूरी तरह खुला छोड़ दिया है। यहां अल्पसंख्यक और बंगाली मतदाताओं का झुकाव कांग्रेस की ओर दिखाई देता है, जबकि भाजपा संगठन और संसाधनों के सहारे संतुलन बनाने की कोशिश में है। यही कारण है कि यह इलाका आने वाले चुनाव में सबसे ज्यादा निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

 

गदरपुर में अरविंद पांडे जैसे अनुभवी चेहरे के बावजूद भाजपा की अंदरूनी कलह और संगठनात्मक असंतोष खुलकर सामने आया है। स्थानीय स्तर पर संवाद की कमी और असंतुष्ट कार्यकर्ताओं की आवाज़ ने पार्टी की स्थिति को कमजोर किया है। कांग्रेस यहां अभी निर्णायक बढ़त में नहीं है, लेकिन यदि विपक्षी वोटों का एकीकरण हुआ तो यह सीट भी भाजपा के लिए सुरक्षित नहीं रह जाएगी।

 

सितारगंज में कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुणा की प्रशासनिक सख्ती और विकास योजनाओं की चर्चा होती है, लेकिन जमीनी स्तर पर संवाद की कमी को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। भाजपा यहां अब भी मजबूत दावेदार बनी हुई है, मगर बढ़ती नाराजगी ने मुकाबले को एकतरफा नहीं रहने दिया। कांग्रेस के लिए यह सीट चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन बदले हुए माहौल में संभावनाओं से खाली नहीं।

 

नानकमत्ता और बाजपुर जैसे इलाकों में कांग्रेस ने न केवल चुनावी जीत दर्ज की है, बल्कि संगठनात्मक रूप से भी खुद को मजबूत किया है। श्रमिक, अल्पसंख्यक और हाशिए के समुदायों का भरोसा कांग्रेस के पक्ष में जाता दिख रहा है। भाजपा के लिए यहां वापसी आसान नहीं है और उसे स्थानीय मुद्दों पर दोबारा भरोसा कायम करना होगा।

 

जसपुर-जसपुर क्षेत्र कांग्रेस के लिए प्रतीकात्मक भी है और रणनीतिक भी। 2017 में यही वह इलाका था, जिसने तराई में कांग्रेस की राजनीतिक मौजूदगी को जिंदा रखा। आज हालात यह हैं कि कांग्रेस की पकड़ यहां और मजबूत हुई है, जबकि भाजपा को लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है।

 

काशीपुर और खटीमा जैसे क्षेत्रों में भाजपा अब भी संतुलन बनाए हुए है। शहरी मतदाता, व्यापारिक वर्ग और संगठनात्मक ताकत भाजपा को बढ़त देती है, खासकर खटीमा में, जहां मुख्यमंत्री का गृह क्षेत्र होने का लाभ साफ दिखाई देता है। हालांकि, यदि मुख्यमंत्री तराई की किसी दूसरी सीट से चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं, तो इसका असर अप्रत्यक्ष रूप से इन इलाकों के राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ेगा।

 

इन सभी इलाकों को समग्र रूप से देखें तो साफ संकेत मिलते हैं कि तराई में भाजपा अब पहले जैसी अजेय स्थिति में नहीं है। कांग्रेस ने भले ही अभी पूर्ण बहुमत वाली तस्वीर नहीं बनाई हो, लेकिन सामाजिक समीकरण, मुस्लिम और बंगाली वोटों का झुकाव, और भाजपा की अंदरूनी खींचतान ने मुकाबले को बराबरी पर ला खड़ा किया है। दूसरी ओर, भाजपा के पास अब भी सरकार, संगठन और मजबूत चेहरे हैं, जो अंतिम समय में समीकरण बदलने की क्षमता रखते हैं।

 

निचोड़ यही है कि 2027 में तराई की लड़ाई एकतरफा नहीं होगी। कांग्रेस के पास मौका है कि वह भाजपा पर भारी पड़े, लेकिन यह तभी संभव है जब वह गुटबाजी से ऊपर उठकर संगठित और स्पष्ट रणनीति अपनाए। वहीं भाजपा के लिए यह चुनाव एक साफ चेतावनी है कि यदि उसने संवाद, सामाजिक संतुलन और ज़मीनी विकास को प्राथमिकता नहीं दी, तो तराई की वही ज़मीन, जो कभी उसका सबसे मजबूत किला मानी जाती थी, उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है।