*क्या तराई में कांग्रेस खुद की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है? भाजपा सरकार से नाराज़ जनता और कांग्रेस की गुटबाज़ी के बीच 2027 का निर्णायक इम्तिहान*

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*क्या तराई में कांग्रेस खुद की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है?

भाजपा सरकार से नाराज़ जनता और कांग्रेस की गुटबाज़ी के बीच 2027 का निर्णायक इम्तिहान*

 

(पार्ट–3 विश्लेषण)

 

✍️ संवाद: महेंद्र पाल मौर्य

रुद्रपुर

 

तराई की राजनीति आज जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां सवाल सिर्फ भाजपा की मज़बूती या कमजोरी का नहीं रह गया है, बल्कि कांग्रेस की विश्वसनीयता और उसकी आंतरिक एकजुटता का भी है। भाजपा सरकार के खिलाफ महंगाई, बेरोज़गारी, कानून व्यवस्था, जातिवाद, सांप्रदायिकता और क्षेत्रवाद को लेकर आम जनता में नाराज़गी साफ दिखाई दे रही है। धार्मिक आयोजनों और सामाजिक मेलों से लेकर बाज़ार और गांव की चौपालों तक सरकार के प्रति असंतोष का उबाल महसूस किया जा सकता है। ऐसे माहौल में स्वाभाविक रूप से निगाहें कांग्रेस की ओर जाती हैं, लेकिन यहीं कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आ जाती है—उसकी गुटबाज़ी।

 

तराई में कांग्रेस के पास नेताओं की कमी नहीं है। किच्छा से तिलकराज बेहड़ जैसे जमीनी नेता हों, जिला अध्यक्ष हिमांशु गाबा, पूर्व नगर अध्यक्ष सीपी शर्मा, ममता रानी, मीना शर्मा, संजय जुनेजा, मोहन खेड़ा, संदीप चीमा, जितेंद्र शर्मा, काशीपुर के वरिष्ठ नेता, जसपुर के विधायक आदेश चौहान, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, उप नेता प्रतिपक्ष भुवन कापड़ी और अन्य क्षेत्रीय चेहरे—ये सभी अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव रखते हैं। लेकिन समस्या यह है कि यह प्रभाव अक्सर संगठन को मजबूत करने के बजाय आपसी खींचतान में उलझा रहता है। जनता के बीच यह संदेश जाता है कि कांग्रेस सत्ता की नहीं, बल्कि आपसी प्रतिस्पर्धा की राजनीति कर रही है।

 

आम आदमी आज भाजपा सरकार से नाराज़ है, लेकिन वह यह भी देख रहा है कि कांग्रेस विकल्प के रूप में कितनी तैयार है। सवाल यह है कि जब कांग्रेस अपने भीतर ही नेतृत्व, पद और प्रभाव को लेकर एक राय नहीं बना पा रही, तो वह जनता की बुनियादी समस्याओं—रोज़गार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और महंगाई—पर कितनी गंभीर होगी। यही संदेह कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है।

 

तराई में सामाजिक समीकरण कांग्रेस के पक्ष में बनते दिख रहे हैं। अल्पसंख्यक, श्रमिक, किसान, बंगाली और हाशिए के समुदाय भाजपा की नीतियों से असहज हैं और बदलाव की चाह रखते हैं। लेकिन यह तब ही कांग्रेस के पक्ष में ठोस वोट में बदलेगा, जब पार्टी एकजुट होकर स्पष्ट नेतृत्व और साझा एजेंडा पेश करेगी। केवल भाजपा-विरोध के भरोसे चुनाव नहीं जीते जा सकते, खासकर तब जब भाजपा के पास सत्ता, संगठन और संसाधनों की ताकत हो।

 

कांग्रेस के सामने 2027 की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह गुटों की राजनीति से ऊपर उठकर सामूहिक नेतृत्व का मॉडल अपनाए। तराई में यदि कांग्रेस यह संदेश देने में सफल होती है कि सभी बड़े नेता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर एक मंच पर हैं, तो भाजपा की मुश्किलें बढ़ना तय हैं। लेकिन यदि मौजूदा हालात बने रहते हैं, जहां हर नेता अपनी अलग लाइन खींचता है, तो भाजपा की कमजोर होती पकड़ के बावजूद कांग्रेस अवसर गंवा सकती है।

 

निचोड़ साफ है। तराई में भाजपा का किला दरक जरूर रहा है, लेकिन कांग्रेस उस किले को ढहाने की स्थिति में तभी आएगी, जब वह खुद को भीतर से मजबूत करेगी। जनता आज सरकार से नाराज़ है, पर वह किसी भ्रमित और बंटी हुई पार्टी पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करेगी। 2027 का चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ सत्ता में वापसी की लड़ाई नहीं, बल्कि अपनी साख बचाने और खुद को एक विश्वसनीय विकल्प साबित करने की आखिरी बड़ी परीक्षा भी है। अगर कांग्रेस इस परीक्षा में गुटबाज़ी छोड़कर संगठन, संवाद और ज़मीनी मुद्दों को प्राथमिकता देती है, तो तराई उसके लिए नई शुरुआत बन सकती है। नहीं तो इतिहास एक बार फिर यही दोहराएगा कि अवसर सामने था, लेकिन कांग्रेस उसे संभाल नहीं पाई।