अंकिता भंडारी हत्याकांड ने हिलाई BJP की नींव, पौड़ी से जिला पंचायत सदस्य किरण शर्मा का इस्तीफा, VIP संस्कृति पर फूटा आक्रोश
रुद्रपुर -उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड ने एक बार फिर राज्य की राजनीति में तेज भूचाल पैदा कर दिया है। पौड़ी जनपद से जिला पंचायत सदस्य किरण शर्मा ने भारतीय जनता पार्टी से इस्तीफा देकर न केवल पार्टी नेतृत्व बल्कि राज्य सरकार की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह इस्तीफा ऐसे वक्त आया है जब प्रदेशभर में अंकिता को न्याय दिलाने की मांग लगातार तेज होती जा रही है और जनाक्रोश सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक साफ दिखाई दे रहा है।
किरण शर्मा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक के माध्यम से अपने इस्तीफे की सार्वजनिक घोषणा करते हुए पार्टी के भीतर व्याप्त चुप्पी और VIP संस्कृति पर सीधा हमला बोला। उन्होंने लिखा कि उनकी ही पार्टी के लोग इस जघन्य हत्याकांड पर मूकदर्शक बने हुए हैं और जिन लोगों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, उन्हीं कथित VIP व्यक्तियों को जन्मदिन की बधाइयाँ दी जा रही हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह सब देखकर उन्हें इस बात पर शर्म महसूस हो रही है कि वे किस राजनीतिक दल से जुड़ी हुई हैं। उनका यह बयान सत्ता के संरक्षण और असंवेदनशील रवैये की ओर स्पष्ट संकेत करता है।
अपने संदेश में किरण शर्मा ने यह भी कहा कि एक बेटी के साथ हुए इस जघन्य अपराध पर सरकार और संगठन की चुप्पी उन्हें भीतर तक आहत कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक पीड़िता अंकिता भंडारी को पूर्ण और निष्पक्ष न्याय नहीं मिलता, तब तक ऐसे राजनीतिक दल में बने रहना उनके आत्मसम्मान के खिलाफ है। उनका इस्तीफा केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पार्टी की नैतिकता और संवेदनशीलता पर गहरा प्रश्नचिह्न के रूप में देखा जा रहा है।
गौरतलब है कि किरण शर्मा से पहले भी भाजपा के भीतर से असंतोष सामने आ चुका है। पूर्व जिला पंचायत सदस्य आरती गौड़ पहले ही अंकिता भंडारी हत्याकांड की जांच पूरी होने तक भाजपा से इस्तीफा दे चुकी हैं। आरती गौड़ ने भी न्याय प्रक्रिया की निष्पक्षता पर संदेह जताते हुए कहा था कि जब तक सच्चाई सामने नहीं आती और दोषियों पर कठोर कार्रवाई नहीं होती, तब तक पार्टी से जुड़े रहना संभव नहीं है। लगातार हो रहे ये इस्तीफे भाजपा के भीतर गहराते असंतोष और बेचैनी को उजागर कर रहे हैं।
अंकिता भंडारी हत्याकांड अब केवल एक आपराधिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह उत्तराखंड की राजनीति में नैतिकता, जवाबदेही और VIP संस्कृति का प्रतीक बन चुका है। आम लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर प्रभावशाली लोगों को बचाने की कोशिश क्यों की जा रही है और सच सामने आने में देरी क्यों हो रही है। पार्टी के अंदर से उठती आवाजें सरकार के लिए स्थिति को और भी असहज बनाती जा रही हैं।
किरण शर्मा और आरती गौड़ जैसी जमीनी नेताओं के इस्तीफे यह साफ संकेत देते हैं कि यह मामला अब सिर्फ विपक्ष के आरोपों तक सीमित नहीं रहा। सत्ता पक्ष के भीतर भी यह भावना मजबूत हो रही है कि यदि अंकिता भंडारी को न्याय नहीं मिला तो इसका राजनीतिक और सामाजिक असर और अधिक गहरा होगा। प्रदेशभर में जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है कि क्या सच सामने आएगा और क्या दोषियों को वास्तव में सजा मिलेगी।
