श्रद्धांजलि की खामोशी और सत्ता के सवाल: पैगा गांव में सुखवंत सिंह को याद कर दबी आवाज़ों ने खोली व्यवस्था की परतें।

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श्रद्धांजलि की खामोशी और सत्ता के सवाल: पैगा गांव में सुखवंत सिंह को याद कर दबी आवाज़ों ने खोली व्यवस्था की परतें।

काशीपुर के पैगा गांव में दिवंगत किसान सुखवंत सिंह की श्रद्धांजलि सभा अत्यंत भावुक और गंभीर वातावरण में आयोजित की गई। यह आयोजन केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वहां मौजूद सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधियों की खामोशी ने सरकार और व्यवस्था को लेकर कई गहरे सवाल खड़े कर दिए। शब्द और संवेदनाएं मंच पर थीं, लेकिन सत्ता और प्रशासन से सीधे टकराने वाली तीखी आवाज़ें पूरे कार्यक्रम में दबती हुई महसूस की गईं।

श्रद्धांजलि सभा में विभिन्न सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों के लोग पहुंचे और सभी ने दुख व्यक्त किया। इसके बावजूद पूरे आयोजन में एक खास तरह का संयम और सतर्कता साफ दिखाई दी। यह सन्नाटा उस पीड़ा को और गहरा करता नजर आया, जो सुखवंत सिंह की मौत के बाद भी उनके परिवार और पूरे गांव में व्याप्त है। लोगों के चेहरों पर शोक के साथ-साथ यह चिंता भी साफ झलक रही थी कि कहीं यह मामला भी समय के साथ अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में न चला जाए।

भारतीय किसान यूनियन के प्रधान के जिला अध्यक्ष हरजीत सिंह बग्गा ने श्रद्धांजलि सभा में गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि सुखवंत सिंह का जाना सिर्फ एक परिवार की क्षति नहीं है, बल्कि यह पूरे किसान समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। उन्होंने बताया कि पीड़ित परिवार का कहना है कि फिलहाल वे सरकार और पुलिस की कार्रवाई से लगभग संतुष्ट हैं, लेकिन यह संतुष्टि पूरी नहीं बल्कि सशर्त है और आगे की कार्रवाई पर उनकी नजर बनी हुई है।

हरजीत सिंह बग्गा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसान यूनियन हर परिस्थिति में परिवार के साथ खड़ी रहेगी। परिवार जैसा निर्णय करेगा, संगठन उसी दिशा में कदम बढ़ाएगा। उन्होंने यह संकेत भी दिया कि यदि जांच या कार्रवाई में किसी भी स्तर पर ढिलाई बरती गई, तो किसान संगठन चुप नहीं बैठेगा और संघर्ष का रास्ता अपनाने से पीछे नहीं हटेगा।

श्रद्धांजलि सभा में मौजूद लोगों के बीच यह चर्चा आम रही कि सरकार की प्रतिष्ठा केवल बड़े-बड़े बयानों से नहीं, बल्कि पारदर्शी, निष्पक्ष और न्यायपूर्ण कार्रवाई से तय होती है। जिस तरह से पूरे कार्यक्रम में आवाज़ें संयमित और सीमित रहीं, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या भय, राजनीति या सत्ता के दबाव में सच को पूरी मजबूती से सामने रखने की हिम्मत कमजोर पड़ती जा रही है।

पैगा गांव की यह श्रद्धांजलि सभा एक ओर जहां सुखवंत सिंह को नम आंखों से याद करने और विदाई देने का क्षण बनी, वहीं दूसरी ओर यह सरकार और प्रशासन के लिए एक मौन लेकिन गहरी चेतावनी के रूप में भी उभरी। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में कार्रवाई केवल कागज़ों तक सिमट कर रह जाती है या वास्तव में न्याय ज़मीन पर उतरता दिखाई देता है।