तीन महिलाएँ, एक साया और तीन साल का इंतज़ार
क्या गुमनाम VIP तक पहुँचेगी CBI जाँच?
#अभी भी अनसुलझे के सवाल# महेंद्र पाल मौर्य “समाचार इंडिया 1” #अंकिताभंडारी की हत्या को तीन साल बीत चुके हैं, लेकिन उत्तराखंड सरकार आज भी उस सच्चाई का पीछा कर रही है, जिसे उसने वक्त रहते बचाया नहीं। कथित VIP एंगल पर CBI जाँच की सिफ़ारिश को पुष्कर सिंह धामी सरकार के लिए किसी भी तरह से क्लीन चिट नहीं माना जा सकता। यह निर्णय दरअसल एक मौन स्वीकारोक्ति है—कि जिन सबसे अहम सवालों के जवाब समय पर मिलने चाहिए थे, वे तब नहीं दिए गए जब उनकी सबसे अधिक ज़रूरत थी। यह सिफ़ारिश न स्वेच्छा से आई, न समय पर, बल्कि जनता के दबाव और लगातार उठते सवालों के बीच सामने आई।
इस बीच अंकिता के पक्ष की पुष्टि कर सकने वाले अधिकांश भौतिक साक्ष्य नष्ट हो चुके हैं। वे वनंतरा रिसोर्ट के मलबे में दब गए—वही रिसोर्ट जहाँ उस पर कथित रूप से “स्पेशल सर्विस” देने का दबाव बनाए जाने की बात सामने आई थी। दीवारें गिरा दी गईं, कमरे मिटा दिए गए और उनके साथ वह संभावित सच्चाई भी दफन हो गई, जो भीतर छिपी हो सकती थी। जिस मामले में सत्ता की भूमिका संदेह के घेरे में रही हो, वहाँ अपराध स्थल का इस तरह नष्ट किया जाना केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि खामोशी का एक गहरा संकेत बन जाता है।
तीन साल बाद स्थिति यह है कि जाँच एजेंसियों के पास फॉरेंसिक साक्ष्यों के बजाय अब इंसानी स्मृतियाँ और गवाहियाँ ही शेष हैं। इसी त्रासद नैतिक गणित में तीन महिलाएँ अब चौथी महिला—अंकिता भंडारी—को न्याय दिलाने का अंतिम रास्ता बनकर सामने आती हैं।
इनमें पहली हैं रेणु बिष्ट, यमकेश्वर की विधायक, जो उस समय राजनीतिक रूप से उस दौर के केंद्र में थीं जब वनंतरा रिसोर्ट को ध्वस्त किया गया। दूसरी हैं आरती गौर, तत्कालीन जिला पंचायत सदस्य, जिनके निर्देश पर जेसीबी मशीनें चलीं और वह ढांचा गिरा दिया गया जिसमें सबसे अहम सबूत मौजूद हो सकते थे। तीसरी हैं अभिनेत्री उर्मिला सनावर उर्फ उर्मिला सुरेश राठौर, जिनके सामने आए ऑडियो खुलासों ने सत्ता को इस कदर झकझोर दिया कि सरकार को भारी जनदबाव के बीच CBI जाँच की सिफ़ारिश करनी पड़ी।
ये तीनों महिलाएँ उस समयरेखा के निर्णायक मोड़ों पर खड़ी दिखाई देती हैं, जहाँ मामला या तो दबा दिया गया या फिर दोबारा ज़िंदा हुआ। आज यही तीनों मिलकर वह एकमात्र जीवित कड़ी बनती हैं, जो जाँच एजेंसियों को उस कथित गुमनाम VIP तक पहुँचा सकती हैं—एक ऐसा साया जो शुरू से इस पूरे मामले पर मंडराता रहा, लेकिन कभी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया।
अंकिता भंडारी हत्याकांड की सबसे निर्मम विडंबना यही है कि तीन महिलाएँ शायद सत्ता, विशेषाधिकार और संरक्षण की परतें उधेड़ सकें, लेकिन चौथी महिला—अंकिता—के पास कोई ढाल नहीं थी। उसने इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाई।
अब सवाल यह है कि क्या CBI जाँच केवल राजनीतिक डैमेज कंट्रोल बनकर रह जाएगी या फिर सच तक पहुँचेगी। यदि यह प्रक्रिया मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के लिए केवल छवि सुधार का माध्यम बनती है, तो यह अंकिता के साथ दूसरा अन्याय होगा। न्याय तभी संभव है जब जाँच उसी व्यवस्था की सीमाओं में न बंधी रहे, जिसने अंकिता को विफल किया। इसे किसी निष्कलंक और निर्भीक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की निगरानी में आगे बढ़ाया जाना आवश्यक है, ताकि न दबाव काम करे, न डर और न ही सत्ता का प्रभाव।
जिस दिन वह गुमनाम VIP कानून के कटघरे में खड़ा होगा, उसी दिन—तीन साल बाद ही सही—अंकिता भंडारी को न्याय मिलने की उम्मीद पूरी होगी।
