“यह पब्लिक है नेताजी सब जानती है” श्रेय लेने की होड़ के बीच भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के साथ विधायक शिव अरोड़ा और मेयर विकास शर्मा की तस्वीर बनी चर्चा का विषय, रुद्रपुर में विकास से ज्यादा सियासी टकराव पर उठने लगे सवाल

श्रेय लेने की होड़ के बीच भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के साथ विधायक शिव अरोड़ा और मेयर विकास शर्मा की तस्वीर बनी चर्चा का विषय, रुद्रपुर में विकास से ज्यादा सियासी टकराव पर उठने लगे सवाल
रुद्रपुर। उत्तराखंड की औद्योगिक राजधानी रुद्रपुर इन दिनों विकास कार्यों से अधिक श्रेय लेने की राजनीति को लेकर चर्चा में है। हाल ही में शहर के ड्रेनेज सिस्टम और प्रस्तावित कुमाऊं प्रवेश द्वार परियोजना को लेकर रुद्रपुर विधायक शिव अरोड़ा और मेयर विकास शर्मा के बीच अलग-अलग स्तर पर राजनीतिक सक्रियता देखने को मिली। दोनों जनप्रतिनिधियों ने इन परियोजनाओं को लेकर अपनी-अपनी भूमिका प्रमुख बताने का प्रयास किया, जबकि वास्तविकता यह है कि दोनों ही परियोजनाएं अभी प्रारंभिक चरण में हैं और धरातल पर इनका काम शुरू नहीं हुआ है। ऐसे में जनता के बीच यह सवाल उठने लगा है कि जब योजनाएं अभी कागजों से बाहर भी नहीं निकली हैं, तब उनके श्रेय को लेकर इतनी होड़ आखिर क्यों मची हुई है।
इसी बीच भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के साथ विधायक शिव अरोड़ा और मेयर विकास शर्मा की एक तस्वीर भी सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का विषय बनी हुई है। तस्वीर भले ही संगठनात्मक एकजुटता का संदेश देती हो, लेकिन दूसरी ओर शहर में दोनों जनप्रतिनिधियों के बीच श्रेय लेने की प्रतिस्पर्धा लगातार सुर्खियां बटोर रही है। लोगों का कहना है कि यदि यही समन्वय शहर के विकास कार्यों में दिखाई देता तो रुद्रपुर की कई वर्षों पुरानी समस्याएं अब तक काफी हद तक दूर हो चुकी होतीं।
भाजपा हमेशा संगठन और अनुशासन की बात करती रही है, लेकिन रुद्रपुर की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को देखकर विपक्ष ही नहीं बल्कि आम लोग भी सवाल उठा रहे हैं कि जब एक ही दल के विधायक और मेयर सार्वजनिक रूप से अलग-अलग दावे करते नजर आते हैं तो इसका सीधा संदेश जनता तक क्या पहुंचता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस प्रकार की प्रतिस्पर्धा न केवल व्यक्तिगत छवि को प्रभावित करती है बल्कि पार्टी की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े करती है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इन घोषणाओं और प्रेस कॉन्फ्रेंसों से आम जनता को आखिर मिला क्या। जिन परियोजनाओं को लेकर लगातार बयान दिए जा रहे हैं, वे अभी स्वीकृति और प्रक्रिया के दौर में हैं। यह भी निश्चित नहीं है कि उनका निर्माण कार्य कब शुरू होगा और कब पूरा होगा। ऐसे में जनता के सामने केवल दावे हैं, लेकिन धरातल पर परिणाम दिखाई नहीं दे रहे हैं।
दूसरी ओर शहर की मूलभूत समस्याएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं। पिछले एक दशक से अधिक समय से रुद्रपुर का मेडिकल कॉलेज पूरी तरह संचालित नहीं हो सका है। भवन बनने के बावजूद मान्यता और अन्य औपचारिकताओं के कारण यह परियोजना आज भी अधर में लटकी हुई है। शहरवासियों का कहना है कि इस मुद्दे पर न तो विधायक की ओर से कोई बड़ा आंदोलन या प्रभावी दबाव दिखाई दिया और न ही मेयर की ओर से कोई ठोस पहल देखने को मिली।
ईएसआई अस्पताल की स्थिति भी लगातार चिंताजनक बनी हुई है। हजारों श्रमिकों और उनके परिवारों के लिए यह अस्पताल बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन सुविधाओं की कमी और व्यवस्थाओं को लेकर शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। इसके बावजूद यह विषय भी राजनीतिक प्राथमिकताओं में पीछे छूटता दिखाई देता है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी रुद्रपुर की तस्वीर संतोषजनक नहीं कही जा सकती। कई दशकों से शहर को कोई नया सरकारी इंटर कॉलेज या सरकारी डिग्री कॉलेज नहीं मिला। निजी शिक्षण संस्थानों का तेजी से विस्तार हुआ है, लेकिन उनकी फीस और शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। इसके बावजूद इस दिशा में कोई व्यापक सरकारी पहल दिखाई नहीं देती।
औद्योगिक नगरी होने के बावजूद स्थानीय युवाओं के सामने रोजगार का संकट आज भी बना हुआ है। सिडकुल में बड़ी संख्या में उद्योग स्थापित होने के बावजूद स्थानीय युवाओं को पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। श्रमिकों के शोषण, अस्थायी रोजगार और श्रम कानूनों के पालन को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन इन समस्याओं के समाधान के लिए कोई निर्णायक प्रयास नजर नहीं आता।
शहर की आधारभूत सुविधाओं की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। हल्की बारिश होते ही कई इलाकों में जलभराव हो जाता है, सड़कें तालाब में तब्दील हो जाती हैं और नालियां उफनने लगती हैं। हर साल यही स्थिति दोहराई जाती है, लेकिन स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल पाया है। ऐसे में ड्रेनेज सिस्टम की नई योजना की घोषणा तब तक जनता को राहत नहीं दे सकती, जब तक उसका काम धरातल पर शुरू होकर पूरा नहीं हो जाता।
रुद्रपुर की जनता अब यह मानने लगी है कि विकास की राजनीति की जगह श्रेय लेने की राजनीति ने अधिक स्थान ले लिया है। लोगों का कहना है कि जनप्रतिनिधियों को एक-दूसरे पर राजनीतिक बढ़त हासिल करने के बजाय समन्वय बनाकर शहर के स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, यातायात, जलनिकासी और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर गंभीरता से काम करना चाहिए। यदि जनप्रतिनिधि घोषणाओं और श्रेय की राजनीति से आगे बढ़कर वास्तविक विकास पर ध्यान नहीं देंगे तो आने वाले समय में जनता अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए इसका जवाब अवश्य देगी।