

“सरकारी आदेश को ठेंगा दिखा रहे निजी स्कूल संचालक और बुक सेलर: लूट जारी, कार्रवाई करने वाला कोई नहीं!”


सरकार द्वारा निजी मान्यता प्राप्त विद्यालयों के लिए सख्त नियम और स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाने के बावजूद जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। नियमों में जहां एक ओर स्कूलों को पारदर्शिता, बच्चों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और अभिभावकों पर आर्थिक बोझ कम करने के लिए बाध्य किया गया है, वहीं दूसरी ओर निजी स्कूल संचालक और बुक सेलर खुलेआम इन आदेशों को पलीता लगाते नजर आ रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि इन सबके बावजूद कार्रवाई करने वाला कोई नहीं दिख रहा, जिससे अभिभावकों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
सरकारी आदेश साफ तौर पर कहता है कि कोई भी विद्यालय अपने परिसर में किताबें, यूनिफॉर्म या अन्य शैक्षणिक सामग्री का विक्रय नहीं करेगा और न ही किसी एक विशेष दुकानदार को इसके लिए अधिकृत करेगा। इसके बावजूद कई स्कूल संचालक बुक सेलरों के साथ सांठगांठ कर अभिभावकों को एक ही दुकान से महंगी किताबें और ड्रेस खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं। अभिभावकों को विकल्प नहीं दिया जाता और अगर वे बाहर से सामान खरीदने की कोशिश करते हैं तो बच्चों को अप्रत्यक्ष रूप से परेशान किया जाता है।
इतना ही नहीं, एनसीईआरटी और एससीईआरटी की सस्ती और निर्धारित पुस्तकों की बजाय निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें थोपकर शिक्षा को व्यापार बना दिया गया है। जबकि नियम स्पष्ट रूप से केवल उन्हीं अतिरिक्त पुस्तकों की अनुमति देता है जो संबंधित विषय के लिए आवश्यक हों और एनसीईआरटी/एससीईआरटी में उपलब्ध न हों। इसके बावजूद बुक सेलर और स्कूल संचालक मिलकर अभिभावकों की जेब पर डाका डालने में लगे हुए हैं।
पारदर्शिता के नाम पर भी हालात बेहतर नहीं हैं। कई स्कूल न तो अपनी फीस स्ट्रक्चर सार्वजनिक कर रहे हैं और न ही किताबों और यूनिफॉर्म की सूची को सही तरीके से प्रदर्शित कर रहे हैं। वेबसाइट पर जानकारी अपडेट करने और अभिभावकों को समय पर सूचना देने के आदेश भी कागजों तक सीमित नजर आ रहे हैं। वहीं टीसी और मार्कशीट देने में भी अनावश्यक देरी की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
सरकार ने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए काउंसलर और वेलनेस टीचर की नियुक्ति को अनिवार्य किया है, लेकिन कई विद्यालय इस नियम को भी नजरअंदाज कर रहे हैं। छात्रों में बढ़ते तनाव, चिंता और बुलीइंग जैसी समस्याओं के बावजूद स्कूल प्रबंधन इस दिशा में गंभीरता नहीं दिखा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब नियम इतने स्पष्ट और सख्त हैं, तो फिर उनका पालन क्यों नहीं हो रहा? निजी स्कूल संचालकों और बुक सेलरों की मनमानी पर आखिर कब लगाम लगेगी? अभिभावकों की जेब पर पड़ रहे इस खुले डाके के बीच जिम्मेदार विभागों की खामोशी कई सवाल खड़े कर रही है। अगर जल्द ही सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो शिक्षा के नाम पर यह खेल और भी खतरनाक रूप ले सकता है।
