आशाओं को राज्य कर्मचारी का दर्जा और न्यूनतम वेतन देने की मांग, गल्ला मंडी में गरजीं आशा वर्कर्स
2021 में किए गए 11,500 रुपये मानदेय के वादे को पूरा नहीं करने का आरोप, 22 नवंबर को देहरादून में विशाल रैली का ऐलान
रुद्रपुर, 24 अक्टूबर। ऐक्टू से संबद्ध उत्तराखण्ड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन ने आशा कार्यकर्ताओं को राज्य कर्मचारी का दर्जा देने, न्यूनतम वेतन लागू करने, शोषण पर रोक लगाने और लंबित मानदेय का समय पर भुगतान करने सहित विभिन्न मांगों को लेकर शनिवार को गल्ला मंडी में धरना-प्रदर्शन किया। इस दौरान आशा कार्यकर्ताओं ने सरकार के खिलाफ नाराजगी जताते हुए मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन मुख्य चिकित्साधिकारी (सीएमओ) के माध्यम से प्रेषित किया। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि स्वास्थ्य विभाग की तमाम जिम्मेदारियां निभाने के बावजूद आशा कार्यकर्ताओं को उचित मानदेय, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान नहीं मिल रहा है।
सभा को संबोधित करते हुए यूनियन की प्रदेश उपाध्यक्ष रीता कश्यप ने कहा कि भाजपा सरकार को राज्य में दस वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन आशा कार्यकर्ताओं की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार आशाओं को बंधुआ मजदूरों की तरह काम करने के लिए मजबूर कर रही है। स्वास्थ्य विभाग के तमाम कार्य आशा कार्यकर्ताओं के जिम्मे डाल दिए जाते हैं, लेकिन मेहनताने के नाम पर उन्हें मात्र 3,300 रुपये प्रोत्साहन राशि और कुछ कार्यों के लिए कमीशन दिया जाता है, जो न्यूनतम वेतन के मुकाबले बेहद कम है। उन्होंने मांग की कि सरकार आशाओं को राज्य कर्मचारी का दर्जा देकर उनके लिए न्यूनतम वेतन लागू करे।
यूनियन की जिलाध्यक्ष ममता पानू ने कहा कि वर्ष 2021 में आशा कार्यकर्ताओं की हड़ताल के बाद मुख्यमंत्री ने उनसे वार्ता की थी और 11,500 रुपये मानदेय देने का वादा किया था। लेकिन पांच साल बीतने के बावजूद यह वादा पूरा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि सरकार अखबारों में बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर आशा कार्यकर्ताओं के हित में काम करने का संदेश देती है, जबकि धरातल पर उनकी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। आशा कार्यकर्ताओं के लिए न पेंशन की समुचित व्यवस्था है और न ही बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिल रहा है। उन्होंने कहा कि आशाएं गर्भवती महिलाओं की देखभाल से लेकर स्वास्थ्य विभाग के विभिन्न कार्यों तक दिन-रात जिम्मेदारी निभाती हैं, इसके बावजूद उन्हें समय पर भुगतान नहीं किया जाता। कई बार छह-छह महीने तक मानदेय नहीं मिलता, जिससे उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है।
ऐक्टू की जिला सचिव एवं यूनियन की उपसचिव अनिता अन्ना ने कहा कि भाजपा सरकार का रवैया मजदूर विरोधी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार मजदूरों के हितों की अनदेखी कर रही है, जबकि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में कार्यरत आशा कार्यकर्ताओं का खुलेआम शोषण हो रहा है। उन्होंने कहा कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आशाओं को एकजुट होकर आवाज बुलंद करनी होगी। उन्होंने घोषणा की कि 22 नवंबर 2026 को देहरादून में आयोजित होने वाली विशाल रैली में आशा कार्यकर्ता बढ़-चढ़कर भाग लेंगी और अपने हक की मांगों को लेकर देहरादून कूच करेंगी।
भाकपा (माले) के जिला सचिव ललित मटियाली ने धरना-प्रदर्शन को समर्थन देते हुए कहा कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की नियुक्ति और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने में सरकार गंभीरता नहीं दिखा रही है। इसके बावजूद आशा कार्यकर्ताओं पर लगातार काम का दबाव बनाया जाता है और छोटी-छोटी बातों पर उनकी छंटनी किए जाने की शिकायतें सामने आती हैं। उन्होंने आशा कार्यकर्ताओं की मांगों को जायज बताते हुए सरकार से तत्काल समाधान की मांग की।
धरना-प्रदर्शन के दौरान आशा कार्यकर्ताओं ने राज्य कर्मचारी का दर्जा, न्यूनतम वेतन, 11,500 रुपये मानदेय के वादे को पूरा करने, समय पर भुगतान, पेंशन एवं बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने और कार्यस्थल पर शोषण रोकने की मांग उठाई। यूनियन ने स्पष्ट किया कि मांगों की अनदेखी जारी रहने पर आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
इस दौरान गदरपुर ब्लॉक अध्यक्ष काजल मिस्त्री, पूर्व जिला सचिव कुलविंदर कौर, जिला उपाध्यक्ष बबीता कश्यप, सोनिया, पार्वती, कल्पना, लक्ष्मी, सुषमा, नीता पाण्डेय, अनीता बिष्ट, कमला मेलकानी, निर्मला स्यालकोटी, रेनू, गीता, परमजीत, सुखविंदर, रेखा, पूजा शर्मा, सुनीता देवी, अर्चना मिस्त्री, रविंद्र कौर, कंचन रानी, मंजू नेगी, सबीना, नाजमा, राजेश्वरी, गीता देवी, पुष्पा भगत और सपना भट्ट सहित सैकड़ों आशा कार्यकर्ता मौजूद रहीं।
आशाओं को राज्य कर्मचारी का दर्जा और न्यूनतम वेतन देने की मांग, गल्ला मंडी में गरजीं आशा वर्कर्स 2021 में किए गए 11,500 रुपये मानदेय के वादे को पूरा नहीं करने का आरोप, 22 नवंबर को देहरादून में विशाल रैली का ऐलान
