

दूनिया जानती है कि आतंकिस्तान यानी कि पाकिस्तान एक झूठा देश है और हो भी क्यों ना जिस देश की नीव ही झूठ और फरेब पर रखी गई हो वो देश कभी भी सच कैसे वोल सकता है। हम ऐसा क्यों कह रहे हैं इस लेख में हम आपको इसके बारे में विस्तार से समझाएंगे। दरअसल जब भी ईरान की बात होगी तो पाकिस्तान का इंटरनेशनल मंचों पर एक ही स्टेंड रहा कि तुसी भी मुस्लमान ते असी भी मुसलमान लेकिन जैसे ही यारी निभाने का समय आया मतलब जब ईरान पर इजरायल औऱ अमेरिका ने हमला किया तो सबसे पहले पाकिस्तान ने खंजर ईरान की पीठ पर उतार दिया। मैं अपने पाकिस्तानी सुत्रों की बात करूं तो यह बात बिल्कुल साफ हो चुकी है कि जिस दिन अमेरिका ने ईरान पर हमला किया तो पाकिस्तान ने यूएस से करारे-करारे डॉलर लेकर रावलपिंडी स्थित नूरखान एयरबेस अमेरिका को दिया था।

Iran और Pakistan भौगोलिक रूप से पड़ोसी देश हैं और दोनों के बीच लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा है। धार्मिक रूप से भी दोनों देशों में इस्लाम प्रमुख धर्म है, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के संबंध हमेशा सहज नहीं रहे। कई बार सीमा सुरक्षा, आतंकवादी संगठनों की गतिविधियों और क्षेत्रीय रणनीति को लेकर दोनों के बीच तनाव देखा गया है।
हाल के समय में ईरान ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान की सीमा में सक्रिय कुछ चरमपंथी संगठन ईरान के अंदर हमले करते हैं। इन संगठनों में विशेष रूप से बलूचिस्तान क्षेत्र से जुड़े उग्रवादी समूहों का नाम सामने आता रहा है। ईरान का कहना है कि इन समूहों को रोकने के लिए पाकिस्तान पर्याप्त कार्रवाई नहीं कर रहा। दूसरी तरफ पाकिस्तान का कहना है कि वह अपनी सीमा में आतंकवाद के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रहा है और ईरान को भी अपने इलाके में सक्रिय समूहों पर सख्ती करनी चाहिए।
तनाव तब और बढ़ गया जब दोनों देशों के बीच सीमा पार कार्रवाई की घटनाएँ सामने आईं। ईरान ने अपने सुरक्षा हितों का हवाला देते हुए पाकिस्तान की सीमा के भीतर मौजूद कुछ आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की बात कही। इसके जवाब में पाकिस्तान ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी। इस घटना ने दोनों देशों के रिश्तों में अविश्वास को और गहरा कर दिया।
इस पूरे विवाद में अंतरराष्ट्रीय राजनीति की भी बड़ी भूमिका है। पाकिस्तान के संबंध लंबे समय से United States और पश्चिमी देशों के साथ रहे हैं। वहीं ईरान और अमेरिका के बीच संबंध दशकों से तनावपूर्ण हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की विदेश नीति पर पश्चिमी दबाव का प्रभाव पड़ता है, जिससे वह ईरान के साथ खुलकर खड़ा होने से बचता है। यही कारण है कि कुछ लोग इसे “ईरान के साथ धोखा” कहकर भी देखते हैं।
हालांकि सच्चाई इससे थोड़ी अलग और अधिक जटिल है। पाकिस्तान भी अपनी आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों और आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है। बलूचिस्तान जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में उग्रवाद और अस्थिरता पाकिस्तान के लिए भी बड़ी चुनौती है। इसलिए पाकिस्तान कई बार ऐसे कदम उठाता है जो उसके राष्ट्रीय हितों के अनुसार होते हैं, भले ही इससे पड़ोसी देशों के साथ तनाव क्यों न बढ़े।
इसके अलावा चीन और खाड़ी देशों की राजनीति भी इस क्षेत्र में प्रभाव डालती है। पाकिस्तान चीन के साथ बड़े आर्थिक और रणनीतिक प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है, जबकि ईरान भी क्षेत्रीय शक्ति के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है। ऐसे में दोनों देशों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों ही देखने को मिलती है।
अंत में यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि पाकिस्तान ने ईरान को धोखा दिया है। वास्तव में यह मामला अंतरराष्ट्रीय राजनीति, सुरक्षा चिंताओं और क्षेत्रीय रणनीति का मिश्रण है। दोनों देशों के बीच मतभेद जरूर हैं, लेकिन साथ ही यह भी सच है कि दोनों को स्थिर और शांतिपूर्ण सीमा की आवश्यकता है। भविष्य में संवाद और कूटनीति ही वह रास्ता है जिससे दोनों देश अपने मतभेदों को कम कर सकते हैं और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रख सकते हैं।

लेखक विदेश और रक्षा से जुडे मामलों के विशेषज्ञ हैं।
