“देवभूमि उत्तराखंड की राजनीति का काला अध्याय: जब विजय बहुगुणा ने कांग्रेस की पीठ में खंजर घोंपकर लोकतंत्र को मंडी में ला खड़ा किया”।

खबरें शेयर करें -

“देवभूमि उत्तराखंड की राजनीति का काला अध्याय: जब विजय बहुगुणा ने कांग्रेस की पीठ में खंजर घोंपकर लोकतंत्र को मंडी में ला खड़ा किया”।


रुद्रपुर -देवभूमि उत्तराखंड की राजनीति में 18 मार्च 2016 का दिन आज भी एक बड़े सियासी भूचाल के रूप में याद किया जाता है। यह वह दिन था जब सत्ता, सिद्धांत और निष्ठा के बीच टकराव खुलकर सामने आया और कांग्रेस की तत्कालीन सरकार भीतर से हिल गई। उस समय मुख्यमंत्री हरीश रावत के नेतृत्व में चल रही सरकार को अपने ही विधायकों की बगावत का सामना करना पड़ा, जिसमें विजय बहुगुणा एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरे। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ सरकार को संकट में डाला, बल्कि राज्य की राजनीति में दलबदल और सत्ता संघर्ष की नई बहस छेड़ दी।

कांग्रेस, जिसने विजय बहुगुणा को राजनीतिक पहचान दी, उन्हें सांसद बनाया और बाद में राज्य की कमान सौंपकर मुख्यमंत्री पद तक पहुंचाया, उसी दल के भीतर से असंतोष की चिंगारी भड़की। केदारनाथ आपदा के बाद नेतृत्व परिवर्तन हुआ और बहुगुणा को पद से हटाया गया। इसके बाद जो घटनाएं सामने आईं, उन्हें उनके समर्थक राजनीतिक रणनीति बताते हैं, जबकि विरोधी इसे दलगत निष्ठा के खिलाफ कदम मानते हैं। विनियोग विधेयक के दौरान विधानसभा में जो घटनाक्रम हुआ, उसने पूरे राज्य की राजनीति को हिला दिया और बहुगुणा समेत कई विधायकों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

The Chief Minister of Uttarakhand, Shri Vijay Bahuguna meeting the Prime Minister, Dr. Manmohan Singh, in New Delhi on March 16, 2012.

इस बगावत ने हालात इतने बिगाड़ दिए कि राज्य में संवैधानिक संकट खड़ा हो गया और अंततः राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा, जहां सुनवाई के बाद हरीश रावत सरकार की बहाली हुई। लेकिन तब तक राजनीतिक माहौल पूरी तरह बदल चुका था और उत्तराखंड की राजनीति में अविश्वास और अस्थिरता की गहरी लकीर खिंच चुकी थी।

विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने इस पूरे प्रकरण में कड़ा रुख अपनाते हुए नौ बागी विधायकों को अयोग्य घोषित किया। इस सूची में हरक सिंह रावत, सुबोध उनियाल, प्रदीप बत्रा जैसे नाम भी शामिल रहे, जो उस समय के सियासी घटनाक्रम के केंद्र में आ गए थे।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह पूरा प्रकरण उत्तराखंड में “दलबदल की राजनीति” का एक अहम उदाहरण बन गया, जिसने आने वाले वर्षों में सत्ता समीकरणों को प्रभावित किया। इस घटनाक्रम ने यह भी दिखाया कि किस तरह आंतरिक मतभेद और सत्ता संघर्ष किसी भी सरकार को अस्थिर कर सकते हैं। वहीं अलग-अलग राजनीतिक दल और उनके समर्थक इस घटना को अपने-अपने नजरिए से देखते हैं—किसी के लिए यह रणनीतिक फैसला था, तो किसी के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ एक बड़ा कदम।

आज भी जब उत्तराखंड की राजनीति की चर्चा होती है, तो 2016 का यह प्रकरण एक महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में सामने आता है। यह घटना न केवल उस दौर की राजनीतिक उथल-पुथल को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि लोकतंत्र में स्थिरता और विश्वास बनाए रखना कितना जरूरी होता है।

डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध राजनीतिक घटनाओं और विभिन्न दृष्टिकोणों पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचारों और व्याख्याओं के अलग-अलग राजनीतिक मत हो सकते हैं। पाठकों से अपेक्षा है कि वे आधिकारिक दस्तावेजों और न्यायालय के निर्णयों का भी अवलोकन करें।